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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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रज और वीर्यमें क्या है ?

मंस्कन, ईषमे रस और तिलमें तेल सर्वत्र रहता है, इसी प्रकार वीर्य सारे शरीरमें व्याप्त है । ( च० वि० अ० २ श्लो०७३ )

“ प्रायः लोग अण्ड-कोपोको ही वीर्यका स्थान मानते हैं, इस कारण कि रति समयमें वीर्य इन्द्रियोंसे विचकर यहाँ इकट्ठा होता है, और उपस्थ इन्द्रिय द्वारा यहाँसे बाहर निकल जाता है । कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जिस प्रकार श्रोत्र हृदयमें रहकर सारे शरीरमें व्याप्त रहता है, उसी प्रकार वीर्य नाभि-कमलके पास वीर्याश्वमें रहकर सारे शरीरमें फैला रहता है । पुरुषोंकी भाँति स्त्रियोंके शरीरमें भी वीर्य और श्रोत्र वनता है । पुरुषोंमें जो काम वीर्य और श्रोत्रका है, वही स्त्रियोंमें भी है, परंतु स्त्रियोंका वीर्य सन्तानोत्पत्तिमें उपयोगी नहीं होता । जिस प्रकार सन्तानोत्पत्तिके लिये पुरुषोंमें वीर्य प्रधान है, उसी प्रकार स्त्रियोंमें रज प्रधान है ।

इस भाँति रज और वीर्य उत्पन्न होकर प्रकृतिके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं ।

( २ ) रज और वीर्यमें क्या है ?

डाकुरोने अनेक युक्तियोंसे सिद्ध कर दिया है कि वीर्यमें एक प्रकारके कीड़े पाये जाते हैं । डाकुर काल्लिकर (Kalliker) कहते हैं कि शुद्ध वीर्यका कीड़ा \frac{1}{100} इञ्च लम्बा होता है । डाकुर किर्कस (Kirkes) की राय है कि येसे कीड़ोंका सर चिपटा, लम्बा और गोल होता है । सरसे मिली पूँछ \frac{1}{100} से \frac{1}{200} इञ्च तक लम्बी, पतली और पहलुदार होती है । सरकी लम्बाई \frac{1}{1000} और चौड़ाई \frac{1}{3000} इञ्च होती है । ये कीड़े साँप और केतुओंकी भाँति रेंगकर नहीं चलते, किन्तु कुदते हैं । इनके सरकी जड़में एक वारीक तार कीड़ेके आकारसे

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