भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

२४०

सन्तति-शाल ।

पेटमें एकधारगी चोड लगी हो, ऐसी दशाओंमें गर्भगत बालक टेढा हो जाता है। परन्तु बालक टेढा होता कब है? इस विषयमें अनेक मत हैं। कोई यह कहते हैं कि पैदा होते समयमें, कोई यह कहते हैं कि पैदा होने समयके दो तीन मास पहले। प्रायः यह देखा गया है कि जब छः मास तकका गर्भ गिरता है, तब या तो पहले हाथ निकलता है या पैर। कारण इसका यह है कि सातवें महीनेमें बच्चे का सर बोकके कारण नीचे और पैर ऊपरको हो जाते हैं। इससे यह मालूम होता है कि छः महीनेतक गर्भमें बच्चेके रहनेका कोई ढंग ठीक तौरसे नहीं रहता। इसलिये जो समय बच्चेके ऊपर पैर और नीचे सर होनेका है यदि उस समय माताको ऊपर कहे हुए कारणोंमेंसे कुछ हो जाय तो बच्चा पेटमें तिरछा या टेढ़ा हो जाता है। प्रायः ऐसा भी देखा गया है कि जब पैर निकलता है तो यातो दोनों पैर निकलते हैं, या एक ही निकलता है। यह दशा भी एक हाथ निकलनेके समान समझनी चाहिये। किसी किसी के सर और हाथ या सर एक पाँव या चारों हाथ पाँव एक साथ निकलते हैं। यह भयङ्कर दशा है। इसका भी वही कारण है जो पहले लिखा गया है।

जब ऐसा हो कि बालक तिरछा पड़ जाय तो उसका सर सीधे रास्ते पर लाना चाहिये। सबसे पहले बालक गर्भगारके दहिने व्यासमें आता है, इससे कुछ दूर हट कर पिछला भाग सामने और मूलाधारकी बाई ओर रहता है। बालककी पीठ माताके पेटके सामने और बाई ओर रहती है। बालकका मुँह और पेट माँकी पीठकी ओर दहिने तरफ होता है। इसके बाद बालकका सर गर्भगारके बाएँ व्यासमें रहता है। सरका पिछला भाग सामने मूला धारके दहिने तरफ रहता है।