भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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बच्चोंकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है, परन्तु अंगरेजोंमें इस बातकी कड़ी मनाही है कि प्रसूता न उठे । कारण इसका यह है कि उठने बैठनेसे गर्भाशय टल जाता है । उसकी वनावटमें कुछ देढ़ापन आ जाता है । रक्त-स्त्रावका डर रहता है । इसलिये चार दिनतक तो उठ कर बैठना भी न चाहिये, करवट बदल कर लेटना या तकियेका बदला करना हानिकारक नहीं है ।

बच्चा पैदा होते ही गर्भाशय सिकुड़ने लगता है और दस दिनमें आधा रह जाता है । धीरे धीरे घटकर दो महीनेमें ठीक पहले कासा हो जाता है ।

जिस दिन बच्चा उत्पन्न हो उस दिन सूज आना अच्छा है । यदि दस्त न हो तो कोई हरज नहीं । यहाँ पर यह एक बड़ा भारी प्रश्न है कि प्रसूता को कब और क्या खाना चाहिये ? इस बातको प्रायः सबही मानते हैं कि बच्चा उत्पन्न होनेके दिन तो अन्न कुछ भी न देना चाहिये, क्योंकि दबाव पड़ने और बेचैनी होनेसे इन्द्रियाँ इस योग्य नहीं रहतीं कि वे पचा सकें । इसलिये गरम गरम गायका दूध देना हितकर है । पाँच दिन और कोई चीज न देते हुए केवल गायका दूध ही देना हितकर प्रतीत हुआ है । इसके पीछे सावधाना देते हुए दस दिनके बाद दालका पानी इत्यादि देना उत्तम है, परन्तु हमारे देशमें प्रायः प्रसूता बहुत जल्दी गुण साँठ खाना प्रारम्भ कर देती है । चाहे वह पचे या न पचे, परन्तु उन्हें खानेसे मतलब । इसी कारण दस्त आने लगते हैं और अनेक रोग खड़े हो जाते हैं । जब भोजन पचने लगे तो पौष्टिक पदार्थ खानेमें कोई हरज नहीं है । कहीं कहीं प्रसूताको तीन तीन दिन कुछ नहीं देते । यह बहुत बुरी बात है, पानी तो किसी दशामें न देना चाहिये । इसके स्थान पर गरम दूध देना हितकर है ।