भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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अण्डोंके रोग ।

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और जब बहुतसी गर्ठि होतीहैं तो काले रंगका चिकना तथा बहनेवाला पदार्थ भरा रहता है ।

प्रायः २० से ४० वर्ष तककी अवस्थावाली स्त्रियोंको जो मैथुनकी विशेष इच्छा रखती हैं, चाहे वे कुमारी हों या विवाहिता, यह रोग होता है । इसके अनेक कारण हैं ।

१. रजके विकारसे ।

२. कुपचर्क बढ़ जानेसे ।

३. फलवाहिनी नलीकी एकावृटके कारण रजके ठीक ठीक न निकलनेसे ।

४. गर्भाशयके विकारोंमें रजके ठीक तौर पर न निकलेसे ।

ऐसी दशामें प्रायः लोग गर्भका सन्देह करते हैं, परन्तु यह एक भ्रम है । इसके अनेक लक्षण होते हैं ।

१. धीरे धीरे पेटका बढ़ना ।

२. कमर, जाँघ और रीढ़में कठिन पीड़ा ।

३. अत्यन्त दुर्बलता और निर्बलता ।

४. कभी कभी कम, अधिक सूत्रका आना ।

५. पेटका जलंधरके समान बढ़ जाना ।

६. साँसका जल्दी चलना ।

७. कभी रजका कम आना, कभी अधिक और कभी विलकुल न आना ।

८. बड़े हुए रोगमें पैरोंपर शोथ ।

९ जब एक ही रसौली अण्डेके पास हो तो पेट गोल हो जाता है ।

१० जब कई रसौली हों तो पेट ऊँचा-नीचा हो जाता है ।