संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें३२
सनाति-शास्त्र ।
किं वक्त्रा पैंदा होयने का समय निकट हो (२) जब कि वक्त्रा पैंदा होयनेका समय हो-इसके अनेक कारण हैं ।
१. गन्धर्ग्य पर एक बार साधे चोट पहुँचला ।
२. अन्न होवे समय हाथ पैंट मुँह, नात और चूबड़ का पहने निकलना ।
४. वातके अंगोंका वे डोल होना ।
पेनी ग्रहमें अनेक लक्षण होवे हैं ।
३. गन्धर्ग्य सिंहुकुंडके समय कठिन पांडुका होना ।
२. एकदम रक्तका अधिक निकलना ।
५. प्रत्यक्की वेदना का एक बारका बन्द हो जाना ।
४. देहोयाँ और सँन का अस्ती अस्ती चलना ।
७. जब गन्धर्ग्य कट कर वक्त्रा पैंदमें आ जाता है तब गन्धर्ग्य सिंहुकुंड कर गंताकार होजाता है ।
इंकर न करे कि किसीके यह रोग हो । मौत के मुँहमें चना जाना अच्छा परन्तु यह रोग बुरा है—गन्धर्ग्य हर जगह से फट सकता है, परन्तु उसका नाग कम फटता है, बहति वापे अधिक फटता है । जब कसी साँतरी नाग के ऊपर का हिस्सा फटता है, तो बड़ी कठिनाई पड़ती है । इसका परिणाम अच्छा नहीं होता । माता और वक्त्रा दोनोंकी जान जानके उल्लेख रहता है । बहुत बड़ी कठिनाई तो उस समय होती है जब कि वक्त्रा गन्धर्ग्यके फटे हुये रहने से निकल कर पैंट में आ जाता है ।
४. गन्धर्ग्य का फूल जाना ।
यह साधारण रोग नहीं है इसके अनेक कारण होवे हैं ।
१. बंधनों के डोल पड़नेसे गन्धर्ग्यके बंद का कम होजाता ।