संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्भाशयके रोग ।
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जब यह रोग होता है, तो गर्भ रह जाता है; परन्तु गिर जानेका भी भय रहता है। जब वरावर गर्भ-पात हो जाता हो, तो इस रोगका होना बहुत सम्भव है। इसका जन्मसे ही पीछेसे देढ़ा होना स्त्रीको अवश्य वन्ध्या कर देता है।
१८. गर्भाशयका टल जाना—
यह चार प्रकारसे टलता है। (१) आगे (२) पीछे (३) दहिने और (४) बाएँ।
१. गर्भाशयका आगे टलना—इसके अनेक कारण हैं—
१ गर्भाशय पर पीछे से किसीप्रकार का दबाव पड़नेसे।
२ औंधे झुँह गिर पड़ने से।
३ मैथुन की असावधानी से।
४ गर्भाशय के वन्धनोंके ढीलेपड़ जाने से।
५ रजविकार के अनेक उपद्रवों से।
ऐसी दशा में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं।
१ सूत्राशय पर दबाव के कारण वाधा पहुँचता।
२ सूत्र का एक एक वृद्ध निकलना।
३ पेंड्रूके सामने दर्द और बोभ जान पड़ना।
४ रजका ठीक तीरसे न निकलना।
५ रजका अत्यन्त कष्ट के साथ निकलना।
६ गर्भाशय में रज इकट्ठा हो जाना।
गर्भाशय के मुखका छोटा हो जाना।
जब यह रोग होता है तो स्त्री वन्ध्या हो जाती है। गर्भाशय का मुख छोटा पड़ जाता है। बहुत सी स्त्रियों में जन्मसे ही गर्भाशय आगे को टला हुआ रहता है।
२. गर्भाशयका पीछेकी ओर टलना—इसके कई कारण हैं।
१. मैथुन के समय की असावधानी से।