भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

५. पेड़ और पीठमें कठिन पीड़ा होती है ।

६. धीरे धीरे नाड़ीकी चाल कम पड़ती जाती है ।

यह बड़ा ही भयंकर रोग है । कुशल इतनी ही है कि यह रोग आम तौरसे नहीं होता । इस रोगमें गर्भाशय इस प्रकार उलट जाता है कि उसका रूप ही बदल जाता है । नीचेका भाग ऊपर और ऊपरका नीचे हो जाता है । इसका कोई समय नहीं है । बच्चा पेटमें आनेके पहले गर्भ-समयमें और बच्चा पैदा हो जानेके बाद भी उलटता है । उस समय इसकी तीन दशाएँ होती हैं ।

१. पैंदेका भीतरकी ओर दक्कड़ घुसना और वहाँ गड़्दा पड़ जाना ।

२. दवे हुए पैंदेके भागका मुखमें आ जाना या पैंदेका मुखकी ओर गहरा घुस जाना ।

३. गर्भाशयका उलट जाना ।

जब पेसी दशा होती है, तो बड़ी कठिनाई पड़ती है । यदि शीघ्र यत्न न किया जाय तो अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं; खासकर गर्भावस्थामें बहुत बड़ी कठिनाई होती है ।

२०. गर्भाशयके मुखका अधिक खुल जाना ।

१. जन्मसे ही अधिक खुला रहना ।

२. निर्बलता और वन्यनाके ढीले पड़ जानेसे ।

३. श्रुतिमंथन और गर्भाशयके मुखपर पेसी दवा लगाने से कि जिससे जलन इत्यादि हो ।

४. गिर पड़ने या पेट मसलने इत्यादिसे ।

५. गर्भाशयका मुख किसी यंत्रके द्वारा फैलानेसे जब कि वह पुनः सिकुड़ न सके ।