संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 302 में से
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मन्वर्ति-शास्त्र ।
पतिस्थ मनवाली, उपवास करनेमें पेटके रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।
यह विचार केवल रजोधर्मके तीन दिनोंके लिये ही है । इसका मतलब यह है कि रजवतीके हृदयमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न न होना चाहिये ।
धर्मशास्त्रका मत है कि रजवती पहले दिन चांडाली दूसरे दिन त्रासवानिनी, तीसरे दिन रजकी (धोविन) के नमन अथुद्ध रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है ।
( ध० मगूह )
यह बात विचार करने योग्य है कि जो स्त्री आज त्रासवाणी है, वह कल रजन्वला होनेपर चांडाली हो जावे । नहीं, धर्मप्रकरणमें यह बात इस कारण ले ली गयी है कि धर्मसमभ्कन ही रजवती किसीको स्पर्श न करे । इसी कारण तीन दिन अलग रहने और किसीको स्पर्श न करनेमें यह है कि रजवतीमें बड़ा लाभ तो किसीके स्पर्श न करनेमें नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल किसी प्रकारकी छूतका असर नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल हीन भी बहुत बड़ी होती है । कड़ाकेका जाड़ा पड़ रहा है । शतका समय है, वहजी एक पतली धोतीमें चँडी पिड़गिडा रही है । श्रावाम करनेके लिये परेडी चारपाई या तरता, चिल्लाने को चढाई और आठनेको एक पुराना कम्बल बहुत है । धर्मकी प्रेमियों और छूत अछूत पर जान देनेवाली स्त्रियोंका क्या यही धर्मकी मर्यादा है ? यदि रहे कि शरीरहीसे धर्म होता है । जब शरीर ही नहीं, तो धर्म कहाँसे होगा ? इसलिये धर्मशास्त्रने शरीरकी रक्षा करना ही परम धर्म माना है । ऐसी दशामें रजवतीको यदि सदी लग जावे तो अरुडे, फलवाहिनी नली और गर्भाश्रयमें अनेक रोग लिपट जाते हैं । परिणाम यह होता है स्त्रियाँ और बच्चोंसे मातापै सदाके लिये कि...