भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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जन्त रूगण मिलाकर तेरह प्रकार है। पशुत्वका सम्बन्धी पशुभी साञ्जन और निरञ्जन भेदसे द्विविध है। शरीर और इन्द्रियसे युक्त साञ्जन ओर शरीरैन्द्रियरहित निरञ्जन है। इसका विस्तार पञ्चार्थभाष्यदीपिकासे जान लेना ॥ ९ ॥ समस्तसृष्टिसंहारानुग्रहकारि कारणं तस्यैकस्यापि गुणकर्मभे- दापेक्षया विभाग उक्त पति साद्य इत्यादिना । तत्र पतित्वं निरतिशयदृक्क्रियाशक्तिमत्त्वं तेनैश्वर्येण नित्यसम्बन्धित्वम् आद्यत्वमनागन्तुकैश्वर्यसम्बन्धित्वम् इत्यादर्शकारादिभि- स्तीर्थकरैर्निरूपितम् ॥ १० ॥ समस्त सृष्टि और संहारका अनुग्राहक कारण है वह यद्यपि एक है तथापि गुण और कर्मके भेदसे उसका भेद 'पति साद्य.' इत्यादि पद्यमें वर्णन किया है। निर- तिशय दर्शनक्रियाशक्तिमत्त्व पशुत्व है उसको ऐश्वर्यके साथ नित्यसम्बन्धित्व आद्यत्व और अनागंतुक ऐश्वर्यवत्त्व आदर्शादिकारिकामें तीर्थंकरोने कहा है ॥ १० ॥ चित्तद्वारेणात्मेश्वरसम्बन्धो योग । स च द्विविधः क्रियालक्षणः क्रियोपरमलक्षणश्चेति । तत्र जप्यध्यानादिरूपः क्रियालक्षणः । क्रियोपरमलक्षणस्तु संविद्वृत्यादिसंज्ञित धर्मार्थसाधकव्या- पारो विधि । स च द्विविध प्रधानभूतो गुणभूतश्च । तत्र प्रधानभूत साक्षाद्धर्महेतुः चर्या सा द्विविधा व्रतं द्वाराणि चेति । तत्र भस्मस्नानशय्योपहारजपप्रदक्षिणानि व्रतम् । तदुक्तं भगवता नकुलीशेन । भस्मना त्रिपवणं स्नायीत भस्मान शयीतेति ॥ ११ ॥ चित्तद्वारा आत्मा और ईश्वरका सम्बन्ध योग है। वह क्रियालक्षण और क्रियो- परमलक्षण भेदसे योग द्विविध है। जप ध्यानादिरूप क्रियालक्षण है और संवित् गत्यादिरूप दूसरा है। धर्मार्थ साधक व्यापार विधि है। वहभी प्रधान और गौण भेदसे दो प्रकार है। साक्षात् धर्मसाधक चर्या प्रथम है सोभी व्रत और द्वारभेदसे दो प्रकार है। भस्मस्नान, शय्या, उपहार, जप, और प्रदक्षिणा व्रत है। त्रिकाल भस्म स्नान और भस्ममें शयन करे इत्यादि नकुलीशनेभी कहा है ॥ ११ ॥