भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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~दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १९५) दशक्षण एकादशक्षणादि क्रम मुक्तावल्यादिग्रन्थोंमें स्पष्ट हैं यही पीलुपाक ( परमाणुपाक ) वादियोंकी प्रक्रिया है। इनके मतमें परमाणुसेही रूपनाशपूर्वक रूपान्तरोत्पत्ति होती है पिठर ( द्व्यणुकादि अवयवी ) पाकवादियोंकी प्रक्रिया नैया- यिकोंके सम्मत है ॥ १५ ॥ विभागजविभागो द्विविधः । कारणमात्रविभागजः कारणाकार- णविभागजश्च । तत्र प्रथमः कथ्यते । कार्य्यव्याप्ते कारणे कर्मोत्पन्नं यदावयवान्तराद्विभागं विधत्ते न तदाकाशादिदेशा- द्विभागं ।यदात्वाकाशादिदेशाद्विभागः न तदावयवान्तरादिति स्थितिनियमः कर्मणो गगनविभागाकर्तृत्वस्य द्रव्यारम्भकसँ- योगविरोधिभागारम्भकत्वेन धूमस्य धूमध्वजसँसर्गेणैव व्यभि- चारानुपलम्भात् ततश्चावयवकर्म अवयवान्तरादेव विभागं करोति नाकाशादिदेशात् तस्माद्विभागाद्द्रव्यारम्भकसंयोगनि- वृत्तिः। तत कारणाभावात् कार्य्याभाव इति न्यायाद्वयविनि- वृत्ति , निवृत्तेऽवयविनि तत्कारणयोरवयवयोर्वर्त्तमानो विभागः कार्य्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वाऽवयवमपेक्ष्य मक्रियस्यैवावयवस्य कार्य्यसंयुक्तादाकाशदेशाद्विभागमारभते न निष्क्रियस्य कारणाभावात् ॥ १६ ॥ कारणमात्र विभागज और कारणाकारणविभागज भेदसे विभागज विभाग दो प्रकार है उसमें प्रथम इस भाँति है कि कार्यसे व्याप्त कारणमें उत्पन्न कर्म्म जिस समय अवयवसे विभाग उत्पन्न करता है उस समय आकाशदेशसे विभाग नहीं होता जब आकाशदेशसे विभाग होगा तब अवयवान्तरमे न होगा ऐसा स्थितिका नियम है जिस प्रकार धूमका वह्निके साथ व्यभिचार नहीं होता है अर्थात् वह्निके अभावस्थलमें नहीं रहता है इसी प्रकार द्रव्यका आरम्भक संयोगविरोधी विभाग आरम्भक होनेसे गगनादि विभाग कर्तृत्व कर्मका नहीं रहता है। इसलिये अवयवका कर्म अवयवान्तरमे विभागोत्पादन करता है आकाशदेशमें नहीं करता अनन्तर विभागसे द्रव्यके आरम्भकप्रयोगकी निवृत्ति होती है अनन्तर कारण न होनेसे कार्य्यभी नहीं होता है इस न्यायसे अवयवी ( कार्य ) की निवृत्ति होती है अवयवकी

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