भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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०दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २३३ ) पासामग्र्यामिव वृक्षसामग्री अपरथा तस्याकस्मिकत्वं प्रसङ्गे त्। तस्मात् परतस्त्वेन स्वीकृताप्रामाण्यं विज्ञानसामग्रीजन्या- श्रितमित्यतिव्याप्तिरापद्येत ॥ ३० ॥ स्वतः प्रामाण्यही किसको कहते हो प्रामाण्यके स्वतः जन्मको १, या स्वाश्रयज्ञान- जन्यको २, किंवा स्वाश्रयज्ञानसामग्रीजन्यको ३, अथवा ज्ञानसामग्रीजन्य- ज्ञानविशेषाश्रितको ४, या ज्ञानसामग्रीमात्रसे जन्यज्ञानविशेषाश्रितको ५? कार्यकार- णभाव दोनों भेद समानाधिकरण होनेसे एकमें असम्भव हैं अतः प्रथमपक्ष अस- म्भव है । द्वितीयभी नहीं कहसकता गुणरूपज्ञानको प्रामाण्यके प्रति समवायिकारण माना तो द्रव्यत्वप्रसङ्ग होगा प्रामाण्यकी जातित्वपक्षमें या उपाधित्वपक्षमें उत्पत्ति न होनेसे तृतीयपक्षभी नहीं हो सकता स्मृतित्वानधिकरणज्ञानको बाधात्यन्ताभाव प्रामाण्यकी उपाधि है अत्यन्ताभाव नित्य होनेसे उसकी उत्पत्ति नही हो सकती इस प्रकार जातिकीभी उत्पत्ति बाधित है । चतुर्थभी नहीं होसकता क्योकि ज्ञान- विशेषही अप्रमा है विशेषसामग्रीके मध्यमें सामान्यसामग्री प्रविष्ट रहती है । जिस प्रकार शिंशपा पदार्थमें वृक्षपदार्थ प्रविष्ट रहता है नहीं तो विशेष अकारणक होगा अत' परतस्त्वेन स्वीकृत अप्रामाण्यको विज्ञानसामग्रीजन्यके आश्रित कहना अतिव्याप्तिग्रस्त है ॥ ३० ॥ पञ्चमविकल्पं विकल्पयामः, कि दोषाभावासहकृतज्ञानसामग्री- जन्यत्वमेव ज्ञानसामग्रीमात्रजन्यत्वम्, किं दोषाभावसहकृतज्ञा- नसामग्रीजन्यत्वम् । नाद्यः दोषाभावासहकृतज्ञानसामग्रीजन्य- त्वमेव परतःप्रामाण्यमिति परतःप्रामाण्यवादिभिरुररीकरणात्। नापि द्वितीय दोषाभावसहकृतत्वेन सामग्र्यां सहकृतत्वे सिद्धे अनन्यथासिद्धान्वयव्यतिरेकसिद्धतया दोषाभावस्य कारण- ताया वज्रलेपायमानत्वात् । अभावः कारणमेव न भवतीति चेत्तदा वक्तव्यम्, अभावस्य कार्य्यत्वमस्ति न वा, यदि नास्ति तदा पटध्वंसानुपपत्त्या नित्यताप्रसङ्ग , अथास्ति किमपराद्धं कारणत्वेनेति सेयमुभयतः पाशारज्जुः । तदुदितमुदयनेन- 'भावो यथा तथाभावः कारणं कार्य्यन्मतम्' इति ॥ ३१ ॥

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