भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ३८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [बौद्ध- भ्रान्तिसे भेद व्यवस्था उपपन्न होसकती है इसम आक्षेपकी आवश्यकता नहीं है जिस प्रकार तिमिराक्रान्त दृष्टिवालोंको आकाशम कभी २ केशोंके समान रेखा दीख पडती है कभी २ उण्ड्रुक अर्थात् मकरीके जालेके समान रेखा दीख पडती है, कभी २ नाडीके समान रेखा दीख पडती है इसी प्रकार ज्ञान वैचित्र्यभी वासना वैचित्र्यसे होता है ॥ ४० ॥ यथोक्तम्-“अवेद्यवेदकाकारा यथा भ्रान्तैर्निरीक्ष्यते । विभक्त- लक्षणग्राह्यग्राहकाकारविप्लवा ॥ तथा कृतव्यवस्थेयं केशादि- ज्ञानभेदवत् । यदा तदा न सञ्चोद्या ग्राह्यग्राहकलक्षणा”॥ इति ॥ तस्माद्बुद्धिरेवानादिवासनावशादनेकाकाराऽवभासत इति सिद्धम् । ततश्च प्रागुक्तभावनाप्रचयबलान्निसिलवासना- च्छेदाद्विगलितविविधविषयाकारोपप्लवविशुद्धविज्ञानोदयो महो- दय इति ॥ ४१ ॥ इसमें प्राचीनोंकी सम्मति भी देते हैं (अवेद्यवेदकाकारेति) वेद्य वेदक स्वरूप शून्य बुद्धिको भ्रान्तोंने विभक्त ग्राह्य ग्राहक स्वरूप भेद भ्रान्तिसे समझा हे निगमन करते हैं (तस्मादिति) अनादि वासनासे बुद्धि ही अनेकाकारसे प्रतिपन्न होती हे यह निर्विवाद हुआ अतः पूर्वोक्त भावना प्रकर्ष वश समस्त वासना नष्ट होने पर नाना प्रकार घटादि विषय भ्रान्ति नष्ट होकर शुद्ध विज्ञान प्रकाशरूप निश्रेयस होता है ॥ ४१ ॥ अन्येतु मन्यन्ते-यथोक्तं बाह्य वस्तुजातं नास्तीति । तदयुक्तम् प्रमाणाभावात् । नच सहोपलम्भनियमं प्रमाणमिति वक्तव्यम् वेद्यवेदकयोरभेदसाधकत्वेनाभिमतस्य तस्याप्रयोजकत्वेन स- न्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् ॥ ननु भेदे सहोपलम्भनियमा- त्मकं साधनं न स्यादिति चेन्न । ज्ञानस्यान्तर्मुखतया च भेदेन- प्रतिभासमानतया एकदेशत्वैककालत्वलक्षणसहत्वनियमा- सम्भवाच्च नीलाद्यर्थस्य ज्ञानाकारत्वे अहमिति प्रतिभासः स्यात् नत्विदमिति प्रतिपत्तिः प्रत्ययाद्व्यतिरेकात् ॥ ४२ ॥