सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
DevanagariHindipublished837 पृष्ठ
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॥ श्रीः ॥ यथाम्बरस्थः सविता त्वेक एव महामते । जलाश्रयाणि चाश्रित्य बहुत्वं सम्प्रदर्शयेत् ॥ एवमेकोऽपि भगवान् नानामन्त्राश्रयेषु च । तुर्यादिपदसंस्थेषु बहुत्वमुपयाति च ॥ —सात्वतसंहिता ४.३३-३४ हे महामते ! जिस प्रकार आकाश स्थित एक ही सूर्य जल के आश्रय में प्रतिबिम्बित होकर अपना बहुत्व रूप प्रकट करते हैं इसी प्रकार एक भगवान् भी अपना बहुत्व रूप अनेक मन्त्रों में तथा चार प्रकार के अपने रूपों (व्यूहों) में प्रकट करते हैं अर्थात् बहुत्व को प्राप्त करते हैं । ✻