भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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२४० सात्वतसंहिता प्रक्षिपेज्जलमध्ये तु विष्वक्सेननिवेदितम् ॥ जलजानां नीरगाणां जन्तूनां तृप्तयेऽथवा । जले किञ्चिद् विनिक्षिप्य शेषमन्नं तदग्रतः ॥ तद्भक्तानां द्विजातीनां निरतानां स्वकर्मसु । —(पा०सं०१८।४०५-४०७) इति तन्निवेदितस्वीकारोऽप्युक्तः । अतएवं सच्चरित्ररक्षायाम्—"विष्वक्सेन- निवेदिते च विकल्पभेदास्तत्तत्संहितानुसारेण प्रयोगपद्धतिरत्नावल्यादिषु भोजराजा- दिभिः स्थापिता द्रष्टव्याः" (पृ० ११७) इत्युक्तम् ॥ ५८ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये दशमः परिच्छेदः ॥ १० ॥ — ❦ ☸ ❧ — जो अन्नादि मन्त्र मूर्त्तियों को निवेदन कर दिया गया है उसमें पुष्प फलादि किञ्चिन्मात्रा में शेष रख कर जल में प्रवाहित कर देवे । बहुत काल तक अपने पास में न रखे । विमर्श—सत्रहवें परिच्छेद में १४५-१४६ श्लोक में विसर्जन का विधान किया गया है; जो शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिए ॥ ५८ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के विभवदेवतार्चन नामक दशम परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १० ॥ — ❦ ☸ ❧ —