भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

त्रयोदशः परिच्छेदः ३१३ चतुष्टये शुद्ध्यादिषट्के लक्ष्याद्याष्टके लक्ष्यादिद्विषट्के च चिन्ताया अनन्तर्गतत्वात् प्रथमं तद्ध्यानमुक्तमिति सूक्ष्मदृष्ट्या बोध्यम्। नन्वेकार्णवशायिनः परितःस्थितदेवीचतुष्टयान्तर्गतप्रीतिविद्ययोरप्यत्र द्विका- दिसमूहेष्वनन्तर्गतत्वात् तयोरपि ध्यानं कुतो नोक्तमिति चेत्, पामरोऽसि, विद्या- सरस्वतीशब्दयोः पर्यायत्वं स्तनन्धयोऽपि जानीते ! "तुष्टिदापुष्टिदाष्टकम्" (१२।२१२) इत्यत्र तुष्टिदाशब्देनोक्तायाः "तुष्टिस्तुहिनसंकाशा" इति पुनस्तुष्टि- शब्देनैव ग्रहणाद् यथा तुष्टिदातुष्टिशब्दयोः पर्यायत्वं ज्ञायते, तथा प्रीतिप्रीति- वर्धनीशब्दयोः पुष्टिदापुष्टिशब्दयोः शान्तिदाशान्तिशब्दयोश्च पर्यायत्वं निरङ्कुशम्। अतः प्रीतिविद्ययोरपि द्विकादिसमूहान्तर्गतत्वादेव पृथग् ध्यानं नोक्तमिति सन्तोष- व्यमायुष्मता। लक्ष्मीध्यानस्य प्रथममेवोक्तत्वात् पुनर्द्विके चतुष्टयेऽष्टके द्विषट्के च तद्ध्यानं नोक्तम्। एवमष्टक एव तुष्टेः सरस्वत्याश्च ध्यानस्योक्तत्वात् पुनर्द्विषट्के नोक्तमिति ध्येयम् ॥ ३५-४३ ॥ भिन्न रूप उन परमात्मा विभु के साधार अथवा निराधार जो सुन्दरियाँ कही गई हैं। हे सङ्कर्षण! अब उनका ध्यान सुनिये ॥ ३५ ॥ चिन्ता इन्द्रधनुष के समान हैं, लक्ष्मी रक्त कमल की कान्ति से युक्त हैं, पुष्टि कनक के समान गौर वर्ण वाली हैं और कीर्ति कुमुद के समान स्वच्छ वर्ण वाली हैं ॥ ३६ ॥ जया का स्वरूप सूर्य के समान, माया अञ्जन के सदृश, शुद्धि पलाशपुष्प के समान, निरञ्जना (माया राहित्य) गुञ्जा के सदृश है। नित्या शक्ति बन्धुजीवपुष्प के समान उज्ज्वल हैं और ज्ञानशक्ति सिता और अरुणा है तथा अपराजिता को विकसित कमल के समान आभा वाली समझना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ प्रकृति रक्त कमल के समान कान्तिमती हैं, सरस्वती सितपीता हैं और सिद्धि सर्वकामप्रदा है, जिनका वर्ण इन्द्रनीलमणि के समान है ॥ ३९ ॥ प्रीतिवर्धनी को सिन्दूरपुञ्ज के वर्ण के समान समझना चाहिये। यशस्करी दुग्ध के समान आभा वाली हैं तथा शान्ति विद्रुम के समान उज्ज्वल हैं ॥ ४० ॥ तुष्टि बर्फ के समान उज्ज्वल हैं, दया वैदूर्य के समान है, निद्रा अयस्कान्त मणि के समान है, क्षमा पीत और अरुण कान्ति वाली है ॥ ४१ ॥ कान्ति दर्पण के समान निर्मल है, धृति गोरोचन के समान उज्ज्वल है, मैत्री बन्धूकपुष्प के समान हैं और रति गौरिक के समान हैं ॥ ४२ ॥ मति मरकत के समान कान्ति वाली है, ये सभी उक्त देवियाँ सर्वदा प्रसन्नमुख रहती हैं ॥ ४३ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरा नानालङ्कारभूषिताः ॥ ४३ ॥ दिव्यस्रग्वेष्टनोपेता वीक्षमाणाः स्वकं पतिम्। सा० सं० - 24