भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

सप्तदशः परिच्छेदः वैभवीयनृसिंहकल्पः नारद उवाच अथ सञ्चोदितो भूयः श्रीपतिर्मुनि्सत्तमाः । हितार्थं भवभीतानां विभुना सीरपाणिना ॥ १ ॥ अथ श्रीनृसिंहकल्पपरिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह सङ्कर्षणेन वासुदेवः परिपृष्ट इत्याह—अथेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनिसत्तम ! सङ्कर्षण द्वारा पुनः इस प्रकार पूछे जाने पर संसार के भय से समस्त जीवों के कल्याण के लिये वासुदेव ने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच भगवन् विधिना केन प्रसादमधिगच्छति । नृणामाराधकानां तु विश्वत्राता नृकेसरी ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—भगवन्निति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे भगवन् ! आराधना करने वाले अपने भक्त जनों पर विश्व की रक्षा करने वाले भगवान् नृसिंह किस प्रकार प्रसन्न होते हैं? ॥ २ ॥ श्रुत्वैवमाह भगवान् शृणुष्व गदतो मम । सिद्धिमोक्षप्रदं मन्त्रं वैभवं मूर्तिमोहजित् ॥ ३ ॥ कामरूपधरं नित्यं नृसिंहस्य महात्मनः । एवं पृष्टो वासुदेवः प्रथमं नारसिंहमन्त्रं शृणुष्वेत्याह—श्रुत्वेति सार्धेन ॥ ३-४ ॥ सङ्कर्षण की बात सुन कर भगवान् वासुदेव ने कहा—हे सङ्कर्षण! मै इस नृसिंह मन्त्र को कह रहा हूँ, आप सुनिये । आप मोह को जीतने वाले मूर्त्तिमान स्वरूप हैं, यह वैभव मन्त्र साक्षात् सिद्धि तथा मोक्ष का दाता है । इतना ही नहीं यह नृसिंह का महामन्त्र अपनी इच्छानुसार स्वरूप धारण करने वाला है ॥ ३ ॥