भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

सप्तदशः परिच्छेदः ३७७ पूर्णेन्दुमण्डलान्तस्थं सुधारसमुद्गिरन्तं शशाङ्कशसंकाशं सपरिवारं मन्त्रनाथं ध्यात्वा, पूजान्ते महाशान्तिं यच्छ यच्छेति प्रार्थयेत् । तत उत्तरदिग्भागे पूर्णेन्दुसदृशे वृत्तकुण्डे क्षीरतण्डुलमघुघृतगुग्गुलतिलचन्दनैः सप्तभिर्द्रव्यैः सप्तरात्रं होममाचरन् केवलपयः- प्राशनं कुर्वन्, परमेशं मन्त्रनाथं प्रत्यहं प्रहराष्टकेऽप्यर्चयन्, होमान्ते कलशस्थस्य भगवतः पयसा शीतलोदकेन च प्रहराष्टकेऽपि सेचनं कुर्वन्, प्रत्यहं स्नानान्ते साधकस्य ब्रह्मारन्ध्रोपर्यमृतं स्रवन्तं मन्त्रनाथं स्मरेत् । अनेन शान्तिर्भवति । अथवा मृण्मयं वैदलं काष्ठजं वा पात्रमादाय तत्र केवलान्नेनाष्टपत्रं कमलं विरचय्य तद्दलाष्टके पिष्टनिर्मितघृतपूरितप्रज्वालितदीपाष्टकं विन्यस्य पुष्पादि- भिरभ्यर्च्य स्विन्नानि सप्तविधबीजानि तदुपरि विकीर्यैकं तोयकुम्भमभ्यर्च्य तदुपरि धूपपात्रं निधायाच्छिन्नधूपप्रसरं यथा तथा कालत्रयेऽपि देशपालानां भूतानां बलिं हरेत् । बलिधर्तॄणां पृष्ठे सप्तपदावधि शान्त्यर्थमच्छिन्ना करकोदकधारामस्त्रमन्त्रेण सेचयेत् ॥ १५५-१८१ ॥ इति शान्तिविधिः ॥ अब सबसे पहले शान्तिविधि कहते हैं—साधक अपने शरीर में होने वाले लौकिक लक्षणों से, अथवा स्वप्नयोग के लक्षणों से, जीवन की स्थिति का ज्ञान कर किसी उपद्रवरहित शोभन स्थान में जाकर केवल शरपत से आच्छादित किसी स्थान में, अथवा वस्त्र से आच्छादित किसी स्थान में जाकर, वहाँ यागगृह का निर्माण करे । उसके मध्य में वेदी निर्माण कर, उस वेदी पर चन्दनचूर्ण, कर्पूर तथा सुगन्धि शालिचूर्ण को एक में मिश्रित कर, पहले जैसा कहा गया है वैसा, उत्तमोत्तम लक्षण युक्त मण्डल निर्माण करे । फिर उस मण्डल के बाहर पूर्वभाग में सुलक्षण कलश जो वस्त्र से छाने गये जल से पूर्ण हो, हेमरत्न, सर्वौषधि एवं पञ्चपल्लव और दूर्वाफल से पूर्ण हो और सुधूपित नवीन शुक्ल वस्त्र से परिवेष्टित हो ऐसे कलश को आधार चक्र के ऊपर स्थापित करे । उसके आठों दिशाओं में वैसा ही सुलक्षण आठ कलश स्थापित करे । उसे चन्दन तथा चूने से अनुलिप्त करे । तण्डुल (= चावल) से परिपूर्ण करे । शुक्ल रेशमी वस्त्र से तथा शुक्ल माला से उसका कण्ठ परिवेष्टित करे । उन कलशों के ऊपर मोती, चावल एवं बीज पूर्ण शराव (पुरवा) स्थापित करे । इस प्रकार आठो दिशाओं के कलशों पर उपकुम्भाष्टक स्थापित कर याग गेह को भी श्वेत चामर संयुक्त एवं श्वेत वस्त्र निर्मित दुकूल वितान से अलङ्कृत करे तथा उसे आच्छन्न कर, दृढ़ श्वेत सूत्र से उस कलशाष्टक के कण्ठ प्रदेश को सात बार चारों ओर से लपेट देवे ॥ १५५-१६४ ॥ तदनन्तर यज्ञ की समस्त सामग्री एकत्रित कर यथाविधि स्नान करे । फिर मन्त्रन्यास कर, हरिद्रा मिश्रित चन्दन से, दूर्वाङ्कुर की लेखनी से, अत्यन्त चिकने भोजपत्र पर, सकारान्त साध्य नाम लिखकर, उसके बाहर कर्णिका सहित अष्टपत्र कमल लिखे । उसके आठो पत्रों पर अधोमुख वकार लिखकर, उसके भीतर प्रणव एवं नमः सम्पुटित वकारान्वित नृसिंह बीज लिखकर, कमल के बाहर ऊर्ध्वमुख एवं अधोमुख संख्या रहित टकार का ऊर्मिका रूप से चारों ओर लिखकर उस सा० सं० - 28