सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४३ २४. प्रतिमापीठप्रासादलक्षण नामक चौबीसवें परिच्छेद में प्रतिमा निर्माण के लिए शिला का चयन एवं बिम्ब के पाँच भेद बताए गए हैं। चित्र, मिट्टी, काष्ठ, शिला एवं लोहे के भेद से पाँच प्रकार के बिम्ब कहे गए हैं। बिम्ब निर्माण के लिए द्रव्य सामग्री का विवेचन कर भित्ति पर चित्र निर्माण अनर्थकारी बताया गया है। बिम्ब बनाने के लिए विभिन्न मान (नाप) बताई गई है। आँख, कान, नाक आदि की नाप यव से बताई गई है। एक अङ्गुल का आठवाँ भाग 'यव' कहलाता है। हयग्रीव बिम्ब के मुख का लक्षण, श्रीनृसिंह वक्त्र का लक्षण, वराहवक्त्र का लक्षण, सत्य सुपर्णादि गरुड़व्यूह का लक्षण, वामनलक्षण तथा पीठलक्षण का कथन किया गया है। एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर जब चिह्न आ जाता है तो वे ही अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार सर्वसामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है। बिम्ब के लिए ग्रहण किए जाने वाले भूखण्ड को जल प्रतिग्रह करे। मन्दिर पर कलश उत्कृष्ट धातु के होने चाहिए। घटों को नेत्र एवं वस्त्र से वेष्टित करे फिर ऋग्वेदियों से एवं सामवेदियों से विभिन्न मन्त्रों का पाठ कराकर उसकी प्रतिष्ठा करे। इसके बाद प्रासादलक्षण का निरूपण है। वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में एक ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिए। ऐसा प्रासाद कल्याणकारी होता है। मन्दिर की ऊँचाई क्षेत्र का तिगुना निर्माण करे अथवा डेढ़ गुना रखे या दुगुना रखे। द्वारों की ऊँचाई गर्भ से दूनी बनावे। इस प्रकार के प्रासाद का नाम अनन्त भुवन है। सलक्षण बिम्ब मान हयग्रीवमुख लक्षण, नृसिंहमुख लक्षण, वराहमुख लक्षण, हयग्रीवादि के तीन चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णुधर्मोत्तर पुराण तथा हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिन्तामणि में व्रतभाग प्रथम खण्ड में देखना चाहिए। २५. प्रतिष्ठाविधि नामक पच्चीसवें परिच्छेद में मूर्ति प्रतिष्ठा वर्णित है। चतुर्द्वार मण्डप के निर्माण का विधान करके वेदी निर्माण की विधि बताई गई है। वेदी में 'मण्डलादि-स्थल' का विभाग क्रम कहा गया है। फिर आठ कुण्डों के निर्माण का प्रकार उल्लिखित है। मण्डप की ऊँचाई और स्नान गृह का विस्तार वर्णन करके बालुकापीठ के मान का निरूपण किया गया है। स्नानार्थ शाला निर्माण के नियम का निरूपण कर नेत्रोन्मीलन गृह का लक्षण कहते हैं। द्वार एवं तोरण लक्षण में चारों दिशाओं में द्वार बनाने का विधान किया गया है। तोरण पाँच हाथ का होना चाहिए। तोरण ध्वज एवं ध्वजाष्टक स्थापित करे। वैभवहीन लोगों के लिए संक्षिप्त विधान भी किया गया है। इसके अनुसार अलग-अलग शालाओं के कर्म एक ही शाला में पूर्ण किए जाते हैं। ३५ हाथ लम्बा और उसका चौथाई चौड़ा याग मण्डप होता है। वेदियौं के निर्माण भी बारह अंगुल के अन्तराल पर होते हैं। चारों ओर वीथी का मान चार हाथ होता है। यदि सात वेदी