भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 621

५६२ सात्वतसंहिता स्तनाभ्यां त्रिकलौ पार्श्वौ त्रियवं स्तनमण्डलम् । यवोन्नतं तथा चाग्राद् विस्तृतं तेन चूचुकम् ॥ १३४ ॥ पार्श्व भाग स्तन से दूर दो कला का बनावे । स्तनमण्डल तीन यव का बनावे । स्तन का चुचुक आगे की ओर बढाते हुए एक-एक यव ऊँचा बनावे ॥ १३४ ॥ लोचनं त्रियवं सार्धं कक्षमानमुदाहृतम् । स्कन्धमानविनिर्मुक्तं पृष्ठमंसावधेः समम् ॥ १३५ ॥ कक्ष (काँख) का मान साढे तीन यव युक्त लोचन निर्माण करे । उसे स्कन्ध के मान से अलग रखे । पीठ एवं कन्धे तक उसे समान रूप में निर्माण करना चाहिए ॥ १३५ ॥ द्रोणीनिकाशसदृशं मध्यराशेः समांसलम् । कक्षान्तर्वेष्टनं विद्धि पञ्चतालं सुलोचनम् ॥ १३६ ॥ वह द्रोणी (दोना) के समान हो । मध्यराशि से मांसल युक्त हो । कक्षान्तर का वेष्टन पञ्चताल मान का होना चाहिए ॥ १३६ ॥ विनाङ्गुलद्वयेनैव द्वे ताले द्विगुणीकृते । यवत्रयसमायुक्ते विद्धि तत्कुक्षिवेष्टनम् ॥ १३७ ॥ त्रियवोनं कलामानं विज्ञेयं नाभिमण्डलम् । तन्मानं त्रियवोनं तु तन्निम्नत्वं विधीयते ॥ १३८ ॥ उस कुक्षि का वेष्टन दो अङ्गुल कम दो ताल का दुगुना करे । उसमें तीन यव और मिला देवे तब कुक्षि का वेष्टन बन जाता है । तीन यव से कम कला मान का नाभिमण्डल निर्माण करे । उसकी गहराई तीन यव से कुछ कम करे ॥ १३७-१३८ ॥ परिधिर्नाभिमध्ये तु त्रितालः सत्रिलोचनः । षड्गोलकं च तन्मानपरिध्यर्थं कटेः स्मृतम् ॥ १३९ ॥ नाभि के मध्य की परिधि सत्रिलोचन तीन ताल की बनावे । कटि पर्यन्त परिधि के लिये उसका मान छः गोलक करे ॥ १३९ ॥ करिकुम्भोपमौ पीनौ परितः पञ्चगोलकौ । स्फिजौ कौपीनराजी च द्व्यङ्गुला मूलतः स्मृता ॥ १४० ॥ हाथी के कुम्भ के समान मोटा, चारों ओर पाँच गोलक का परिमाण वाला स्फिक् (नितम्ब) करे कौपीन राजी मूल से दो अङ्गुल की बनावे ॥ १४० ॥ परितोऽङ्गुलमाना सा मेढ्रं तु त्रिकलं स्मृतम् ।