सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१० सात्वतसंहिता यहाँ तीस हाथ तक के मण्डपों में बनाये जाने वाले कुण्डों का विवरण इस प्रकार समझना चाहिये—छः हाथ के मण्डप में दो-दो अङ्गुल की कमी होने से वहाँ सोलह अङ्गुल का कुण्ड होता है और आठ हाथ के मण्डप में बीस अङ्गुल का कुण्ड तथा सात हाथ के मण्डप में अठारह अङ्गुल का कुण्ड होना चाहिये । विमर्श—चौदह हाथ के मण्डप में आठ अङ्गुल का कुण्ड, तेरह हाथ के मण्डप में छः अङ्गुल अधिक का कुण्ड, बारह हाथ के मण्डप में चार अङ्गुल अधिक का कुण्ड, ग्यारह हाथ के मण्डप में दो अङ्गुल अधिक का कुण्ड और दश हाथ के मण्डप में एक हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये । इसी प्रकार पन्द्रह हाथ से लेकर तीस हाथ तक के मण्डप में एक-एक अङ्गुली की वृद्धि के क्रम से कुण्ड समझना चाहिये । इस प्रकार पन्द्रह हाथ के मण्डप में नव अधिक अङ्गुल का कुण्ड, सोलह हाथ के मण्डप में दश अङ्गुल अधिक और इसी प्रकार तीस हाथ के मण्डप में दो हाथ का कुण्ड निर्माण करना चाहिये । इस प्रकार सोलह अङ्गुलादि क्रम से निर्मित कुण्ड में एक ही मेखला अथवा उससे अधिक दो या तीन मेखलाओं का निर्माण करना चाहिये ॥ १४ ॥ मण्डपोच्छ्रायकथनम् अष्टहस्तोच्छ्रितं पूर्वमतोऽर्धकरवर्धिता । न ह्रासः षट्करान्तानां न्यूनानामुच्छ्रितेर्भवेत् ॥ १५ ॥ त्रयोदशकरादीनां चतुर्णां पातयेत् ततः । अष्टकं चाङ्गुलानां तु सप्तपञ्चचतुः क्रमात् ॥ १६ ॥ अथ मण्टपोच्छ्रायमाह—अष्टहस्तोच्छ्रितमिति द्वाभ्याम् । पूर्वमाद्यं चतुर्दशकर- मितं गृहमष्टहस्तोच्छ्रितम् । अतः परं पञ्चदशकरादयो मण्टपाः क्रमेणार्धकरवर्धिताः । यथा त्रिंशत्करविस्तृतो मण्टपः षोडशहस्तोच्छ्रितः स्यादिति भावः । त्रयोदशकरादीनां चतुर्णां मण्टपानां पूर्वोक्तहस्तोच्छ्राये क्रमादङ्गुलानां मष्टकं सप्तकं पञ्चकं चतुष्कं पात- येत्, ह्रासयेदित्यर्थः । षट्करान्तानां = नवकरादिषट्करान्तानां चतुर्णां तु न्यूनानां = न्यूनहस्तसंख्यानां मण्डपानामुच्छ्रितेरुच्छ्रायस्य ह्रासो न भवेत्, दशहस्तमण्टपोच्छ्रा- यन्यूनो न भवेदित्यर्थः । अत्र मूलभूतसात्वतानुसारेण ह्रास इत्यादिवाक्यस्य पूर्वं विद्यमानत्वेऽपि पाठक्रमादर्थक्रमस्य बलीयस्त्वादित्थं व्याख्यातम् । पारमेश्वरे (१५।११९-१२०) त्वर्थक्रमेणैव पाठोऽप्युपबृंहितः ॥ १५-१६ ॥ पूर्व में कहा गया चौदह हाथ का मण्डप आठ हाथ ऊँचा होना चाहिये । किन्तु नव हाथ से लेकर छः हाथ तक न्यून हाथ वाले मण्डपों की ऊँचाई में ह्रास (कम) करने का नियम नहीं है । इसके बाद पन्द्रह से लेकर तीस हाथ तक के सभी मण्डप क्रमशः आधे हाथ ऊँचे बनाने चाहिये । इसका तात्पर्य यह है कि तीस हाथ का मण्डप सोलह हाथ ऊँचा बनाना चाहिये । तेरह हाथ से लेकर