भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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६७२ सात्वतसंहिता हे लोकधर्म में व्यवस्थित ब्राह्मणो! देवाधिदेव भगवान् ने सभी के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से सङ्कर्षण के लिये यह शास्त्र प्रकाशित किया । मैंने भी मोक्ष सिद्धि के लिये यह शास्त्र भगवान् की प्रसन्नता से प्राप्त किया और आप लोगों के सामने प्रकाशित किया है ॥ ३७९-३८० ॥ परं पापहरं पुण्यं पावनं सद्धिभूतिदम् । इदं भव्याशयानां च वक्तव्यं भावितात्मनाम् ॥ ३८१ ॥ भक्तानामप्रमत्तानां पुण्डरीकाक्षसेविनाम् । धर्मापवर्गसत्कीर्तिसाधुसङ्गाभिलाषिणाम् ॥ ३८२ ॥ भोगेप्सूनाभक्तानां वाक्छलादिरतात्मनाम् । अन्यायेनोपसन्नानां नास्तिकानां विशेषतः ॥ ३८३ ॥ यो गोपायत्ययोग्यानां योग्यानां सम्प्रयच्छति । इममर्थं स मान्यो मे स्वस्ति वोऽस्तु व्रजाम्यहम्॥ ३८४ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां प्रतिष्ठाविधिर्नाम पञ्चविंशः परिच्छेदः ॥ २५ ॥ — ☙ ❊ ❧ — यह पापहर है, पुण्य प्रदान करने वाला है, पावन है और सद् विभूति प्रदान करने वाला है । यह शास्त्र भवितात्मा भव्याशयों से, अप्रमत्त भक्तों से, विष्णु की सेवा करने वालों से, धर्म एवं अपवर्ग, सत्कीर्ति साधु के सङ्ग की अभिलाषा करने वालों से ही प्रकाशित करना चाहिये । जो भोग की इच्छा करने वाले हैं, भगवद् भक्त नहीं हैं उनसे, जो वाक्छल में निरत हैं उनसे, अन्यायपूर्वक समीप आये हैं उनसे, विशेष कर नास्तिकों से, यह शास्त्र कदापि प्रकाशित न करे । इस प्रकार जो अयोग्यों से इस शास्त्र का संगोपन करता है और योग्यों को प्रकाशित करता है अर्थात् इस शास्त्र के प्रकाशन और संगोपन दोनों विधियों को जानता है, वह मेरा भी सम्मान्य होता है । आप लोगों का ऐहिक एवं आमुष्मिक रूप निरवधिक स्वास्ति हो । भगवान् नारद मुनियों को इस प्रकार उपदेश कर चले गये ॥ ३८१-३८४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के प्रतिष्ठाविधि नामक पच्चीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २५ ॥ — ☙ ❊ ❧ —