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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

श्लोकार्धानुक्रमणिका · ७७५ हेमर(त्कौ ? त्नौ)षधिस्नानैः ३८७ | होतव्यं कर्मसिद्धयर्थं १०६ हेमरत्नोदकेनाथ १९८ | होतव्यं प्रणवेनैव ६३८ हेमरत्नौषधिवृक्ष- ३७४ | होतव्यं ब्राह्मणैः सम्यक् ५९२ हेमादिद्रव्यजनिते ६९ | होमान्तमखिलं कृत्वा १४० हेमादिधातवो रत्न- ४५७ | होमान्तमर्चनं कृत्वा १४९ हेमादिधातुनिचयं ४०९ | होमान्ते कलशथस्य ३७५ हेमादिनिर्मितं कुर्यात् १७० | होमार्चनविधानेषु ६६४ हेमाद्युत्थानि पात्राणि ४२२ | होमोपकरणं सर्वं १०२ हेमाब्जभूतं तद्ध्यात्वा ४४० | होमं तत्सिद्धये कृत्वा ४३५ हेमालिपाण्डराभं च ३०८ | हंसमूर्तिमथात्मानं २६५ हेयं चानर्थसिद्धीना- ५२३ | हंसः शुको भरद्वाजः ५४९ हेयः शेषमुपादेयं ४७९ | ह्रस्वदीर्घविभागेन १६ हैमं तदूर्ध्वं कमलं ६४३ | ह्रदाद् वल्मीकशिखराद् ६२३ होतव्यमस्यवामीयं ५९२ | हासादङ्गुलयुग्मस्य ६०९

प्रतिष्ठा मण्डप पूर्व दिशा (ऊपर): पीतवर्ण ध्वज | पीतवर्ण पताका इन्द्र, धाता, भग सुदृढतोरण | पूर्वद्वार | इन्द्र | ऋग्वेद अनन्त | प्रशान्त | ध्रुव | अथर्वा | शिशिर आग्नेय कोण (ऊपर-दाएँ): रक्तवर्ण ध्वज | रक्तवर्ण पताका अग्नि योगिनी | मातृका | गणेश | वरुण कलश दक्षिण दिशा (दाएँ): श्यामवर्ण ध्वज | श्यामवर्ण पताका पूषा, मित्र, वरुण भद्रतोरण | दक्षिणद्वार | यम | यजुर्वेद पर्जन्य | अशोक नैर्ऋत्य कोण (नीचे-दाएँ): कृष्णवर्ण ध्वज | कृष्णवर्ण पताका निर्ऋति वास्तुपीठ पश्चिम दिशा (नीचे): श्वेतवर्ण ध्वज | श्वेतवर्ण पताका अर्यमा, अंश, विवस्वान् सुप्रभोतोरण | पश्चिमद्वार | वरुण | सामवेद संजीवन | अनिल | अमृत | अनिल वायव्य कोण (नीचे-बाएँ): धूम्रवर्ण ध्वज | धूम्रवर्ण पताका वायु क्षेत्रपाल उत्तर दिशा (बाएँ): सुवर्णवर्ण ध्वज | सुवर्णवर्ण पताका त्वष्टा, सविता, विष्णु सुप्रभाततोरण | उत्तरद्वार | सोम | अथर्ववेद प्रभास | श्रीपद | प्रत्युष | धनद ईशान कोण (ऊपर-बाएँ): मेघवर्ण ध्वज | मेघवर्ण पताका ईशान ग्रहपीठ मध्य भाग एवं कुण्ड: आचार्य-कुण्ड सर्वतोभद्रवेदी स्रुक्-स्रुव

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आगमरहस्यम्

सम्पादक एवं व्याख्याकार डॉ. सुधाकर मालवीय

'आगमरहस्य' तन्त्र शैवागम के शास्त्रज्ञ एवं साधक शिरोमणि पण्डित श्रीसरयू प्रसाद द्विवेदी विरचित है। यह ग्रन्थ शारदातिलकतन्त्र के समान है और अनेक तन्त्र ग्रन्थों का सार रूप है। श्रीसरयूप्रसाद द्विवेदी ने विभिन्न शैव, शाक्त एवं वैष्णव ग्रन्थों से विषयों को संकलित करके शैवागम के साधकों के लिए यह संग्रह ग्रन्थ लिखा है। यह ग्रन्थ पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो भागों में प्रस्तुत है। पूर्वार्द्ध में 'तान्त्रिकसिद्धान्तों' का संकलन है और उत्तरार्द्ध में 'प्रयोग-पद्धति' का निरूपण है। प्रथम भाग (पूर्वार्द्ध) में अट्ठाइस अध्यायों में सृष्टिक्रम आदि वर्णित हैं और उत्तरार्द्ध भाग में चौबीस अध्यायों में पूजाक्रम एवं स्तोत्र आदि सङ्कलित हैं। दोनों भागों को मिलाकर प्रायः बारह हजार श्लोक इसमें हैं।

आगमरहस्य का पूर्वार्द्ध भाग इदं प्रथमतया हिन्दी व्याख्या के साथ विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत है। इस ग्रन्थ में आचार्य द्वारा मुख्य रूप से 'शारदातिलकतन्त्र' और उसकी टीका राघवभट्ट की सत्सम्प्रदायकृत् 'पदार्थादर्श' से सहायता ली गई है। अनेक सन्दर्भों में मुख्यरूप से 'कुलार्णवतन्त्र' एवं 'ज्ञानार्णवतन्त्र' तथा 'मन्त्रमहोदधि' से सहायता ली गयी है। इस प्रकार तन्त्रगत मौलिक सिद्धान्त का प्रतिपादन अत्यन्त सरल रूप से प्रस्तुत किया गया है।

तन्त्रप्रयोग में प्रक्रिया का अत्यन्त महत्त्व है। मन्त्र एवं मातृका के साधक को पूजा पद्धति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। इसीलिए आगमरहस्य का उत्तरार्द्ध पद्धति से सम्बद्ध है। अनेक तन्त्र ग्रन्थों के सम्पादक डॉ. सुधाकर मालवीय काशी के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् हैं, जो काशीहिन्दूविश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से सम्प्रति सेवानिवृत्त हैं। इनके द्वारा संशोधित एवं व्याख्यात यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय है, और विद्वानों एवं उपासकों हेतु संग्रहणीय है।


Also can be had from Chowkhamba Krishnadas Academy, Varanasi. ISBN : 978-81-7080-244-X | Price : Rs. 500.00

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