सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 146, कुल 480 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६ सत्यार्थप्रकाशः
अथ सप्तमसमुल्लासारम्भः
ऋचो॒ अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्द्यस्मि॑न्दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः।
यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्वि॒दुस्त इ॒मे समा॑सते ॥१॥
—ऋ० मं० १। सू० १६४। मं० ३९॥
ई॒शा वा॒स्य॑मि॒दꣳ सर्वं॒ यत्किञ्च॒ जग॑त्यां॒ जग॑त्।
तेन॑ त्य॒क्तेन॑ भुञ्जीथा॒ मा गृ॑धः॒ कस्य॑ स्वि॒द्धन॑म् ॥२॥
—यजु० अ० ४०। मं० १॥
अ॒हम्भुवं॒ वसू॑नः पू॒र्व्यस्पति॑र॒हं धना॑नि सं ज॑यामि॒ शश्वतः॑।
मां ह॑वन्ते पि॒तरं॒ न जन्त॑वो॒ऽहं दा॒शुषे॒ विभ॑जामि भोर्जनम् ॥३॥
—ऋ० मं० १०। सू० ४८। मं० १॥
अ॒हमिन्द्रो॒ न परा॑ जिग्य॒ इद्धनं॒ न मृ॒त्यवे॒ऽवत॑स्थे कदा॑च॒न।
सोम॒मिन्मा॑ सु॒न्वन्तो॑ याचता॒ वसु॒ न मे॑ पू॒रवः॑ स॒ख्ये रि॑षाथन ॥४॥
—ऋ० मं० १०। सू० ४८। मं० ५॥
अ॒हं दां॑ गृण॒ते पू॒र्व्यं वस्व॒हं ब्रह्म॑ कृणवं॒ मह्यं॑ व॒र्धन॑म्।
अ॒हं भुवं॑ यज॑मानस्य चोदि॒ताऽय॑ज्वनः सा॒क्षि विश्व॑स्मिन्भरे ॥५॥
—ऋ० मं० १०। सू० ४९। मं० १॥
(ऋचो अक्षरे) इस मन्त्र का अर्थ ब्रह्मचर्याश्रम की शिक्षा में लिख चुके हैं अर्थात् जो सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, विद्यायुक्त और जिस में पृथिवी सूर्यादि लोक स्थित हैं और जो आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है उस को जो मनुष्य न जानते न मानते और उस का ध्यान नहीं करते वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं।
( प्रश्न ) वेद में ईश्वर अनेक हैं इस बात को तुम मानते हो वा नहीं?
( उत्तर ) नहीं मानते क्योंकि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिस से अनेक ईश्वर सिद्ध हों। किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है।
( प्रश्न ) वेदों में जो अनेक देवता लिखे हैं उस का क्या अभिप्राय है?
( उत्तर ) देवता दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण कहाते हैं जैसी कि पृथिवी, परन्तु इस को कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। देखो ! इसी मन्त्र में कि ‘जिस में सब देवता स्थित हैं, वह जानने और उपासना करने योग्य ईश्वर है।’ यह उनकी भूल है जो देवता शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हैं। परमेश्वर देवों का देव होने से महादेव इसीलिये कहाता है कि वही सब जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्त्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है।
जो ‘त्रयस्त्रिं॑शत्त्रिशता०’ इत्यादि वेदों में प्रमाण हैं इस की व्याख्या शतपथ