भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 480 में से

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पृष्ठ 195

नवमसमुल्लासः १९५


( प्रश्न ) अध्यारोप का करने वाला कौन है?
( उत्तर ) जीव।
( प्रश्न ) जीव किस को कहते हो?
( उत्तर ) अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन को।
( प्रश्न ) अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन दूसरा है वा वही ब्रह्म?
( उत्तर ) वही ब्रह्म है।
( प्रश्न ) तो क्या ब्रह्म ही ने अपने में जगत् की झूठी कल्पना कर ली?
( उत्तर ) हो, ब्रह्म की इससे क्या हानि?
( प्रश्न ) जो मिथ्या कल्पना करता है क्या वह झूठा नहीं होता?
( उत्तर ) नहीं। क्योंकि जो मन, वाणी से कल्पित वा कथित है वह सब झूठा है।
( प्रश्न ) फिर मन वाणी से झूठी कल्पना करने और मिथ्या बोलने वाला ब्रह्म कल्पित और मिथ्यावादी हुआ वा नहीं?
( उत्तर ) हो, हम को इष्टापत्ति है।

वाह रे झूठे वेदान्तियो ! तुम ने सत्यस्वरूप, सत्यकाम, सत्यसङ्कल्प परमात्मा को मिथ्याचारी कर दिया। क्या यह तुम्हारी दुर्गति का कारण नहीं है? किस उपनिषत्, सूत्र वा वेद में लिखा है कि परमेश्वर मिथ्यासङ्कल्प और मिथ्यावादी है? क्योंकि जैसे किसी चोर ने कोतवाल को दण्ड दिया अर्थात् ‘उलटि चोर कोतवाल को दण्डे’ इस कहानी के सदृश तुम्हारी बात हुई। यह तो बात उचित है कि कोतवाल चोर को दण्डे परन्तु यह बात विपरीत है कि चोर कोतवाल को दण्ड देवे। वैसे ही तुम मिथ्या संकल्प और मिथ्यावादी होकर वही अपना दोष ब्रह्म में व्यर्थ लगाते हो।

जो ब्रह्म मिथ्याज्ञानी, मिथ्यावादी, मिथ्याकारी होवे तो सब अनन्त ब्रह्म वैसा ही हो जाय क्योंकि वह एकरस है; सत्यस्वरूप, सत्यमानी, सत्यवादी और सत्यकारी है। ये सब दोष तुम्हारे हैं; ब्रह्म के नहीं।

जिस को तुम विद्या कहते हो वह अविद्या है और तुम्हारा अध्यारोप भी मिथ्या है क्योंकि आप ब्रह्म न होकर अपने को ब्रह्म और ब्रह्म को जीव मानना यह मिथ्या ज्ञान नहीं तो क्या है? जो सर्वव्यापक है वह परिच्छिन्न न होने से अज्ञान और बन्ध में कभी नहीं गिरता क्योंकि अज्ञान परिच्छिन्न एकदेशी अल्प अल्पज्ञ जीव में होता है; सर्वज्ञ सर्वव्यापी ब्रह्म में नहीं।

अब मुक्ति बन्ध का वर्णन करते हैं

( प्रश्न ) मुक्ति किसको कहते हैं?
( उत्तर ) ‘मुञ्चन्ति पृथग्भवन्ति जना यस्यां सा मुक्तिः’ जिस में छूट जाना हो उस का नाम मुक्ति है।
( प्रश्न ) किस से छूट जाना?
( उत्तर ) जिस से छूटने की इच्छा सब जीव करते हैं?
( प्रश्न ) किस से छूटने की इच्छा करते हैं?
( उत्तर ) जिस से छूटना चाहते हैं?
( प्रश्न ) किस से छूटना चाहते हैं।
( उत्तर ) दुःख से।

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