सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ || सत्यार्थप्रकाशः
शब्द बहुत अच्छा अर्थ वाला है परन्तु विद्याहीन मूढ़ों ने उसके उत्तम अर्थ को छोड़ कर निकृष्ट अर्थ पकड़ लिया। जो आजकल शिवादि पांचों की मूर्तियां बनाकर पूजते हैं उन का खण्डन तो अभी कर चुके हैं। पर जो सच्ची पञ्चायतन वेदोक्त और वेदानुकूलोक्त देवपूजा और मूर्त्तिपूजा है वह सुनो—
मा नो॑ वधीः पि॒तरं॒ मोत मा॒तर॑म् ॥१॥ यजु०॥
आ॒चार्य्य॑ऽउपनय॑मानो ब्रह्मचारिण॑मिच्छते ॥२॥
अतिथि॑र्गृ॒हानुप॑गच्छेत् ॥३॥ अथर्व०॥
अर्च॑त॒ प्रार्च॑त प्रि॒यमे॑धासो॒ अर्च॑त ॥४॥ ऋग्वेदे०॥
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ॥५॥ —तैत्तिरीयोप० ॥
कतम एको देव इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥६॥
—शतपथ प्रपाठ० ५। ब्राह्मण ७। कण्डिका १०॥
मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्य्यदेवो भव अतिथिदेवो भव ॥७॥
—तैत्तिरीयोप० ॥
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैरस्तथा ।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥८॥
पूज्यो देववत्पतिः ॥९॥ मनुस्मृतौ ॥
प्रथम माता मूर्त्तिमती पूजनीय देवता, अर्थात् सन्तानों को तन, मन, धन से सेवा करके माता को प्रसन्न रखना, हिंसा अर्थात् ताड़ना कभी न करना। दूसरा पिता सत्कर्त्तव्य देव। उस की भी माता के समान सेवा करनी ॥१॥
तीसरा आचार्य जो विद्या का देने वाला है उस की तन, मन, धन से सेवा करनी ॥२॥
चौथा अतिथि जो विद्वान्, धार्मिक, निष्कपटी, सब की उन्नति चाहने वाला जगत् में भ्रमण करता हुआ, सत्य उपदेश से सब को सुखी करता है उस की सेवा करें ॥३॥
पांचवां स्त्री के लिये पति और पुरुष के लिये स्वपत्नी पूजनीय है ॥८॥
ये पांच मूर्त्तिमान् देव जिन के संग से मनुष्यदेह की उत्पत्ति, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश की प्राप्ति होती हैं ये ही परमेश्वर को प्राप्ति होने की सीढ़ियां हैं। इन की सेवा न करके जो पाषाणादि मूर्त्ति पूजते हैं वे अतीव पामर, नरकगामी तथा वेदविरोधी हैं।
( प्रश्न ) माता पिता आदि की सेवा करें और मूर्त्तिपूजा भी करें तब तो कोई दोष नहीं?
( उत्तर ) पाषाणादि मूर्त्तिपूजा तो सर्वथा छोड़ने और मातादि मूर्त्तिमानों की सेवा करने ही में कल्याण है। बड़े अनर्थ की बात है कि साक्षात् माता आदि प्रत्यक्ष सुखदायक देवों को छोड़ के अदेव पाषाणादि में शिर मारना स्वीकार किया। इसको लोगों ने इसीलिये स्वीकार किया है कि जो माता पितादि के सामने नैवेद्य वा भेंट पूजा धरेंगे तो वे स्वयं खा लेंगे और भेंट पूजा ले लेंगे तो हमारे मुख वा हाथ में कुछ न पड़ेगा। इससे पाषाणादि की मूर्त्ति बना, उस के आगे नैवेद्य धर, घण्टानाद टं टं पूं पूं और शङ्ख बजा, कोलाहल कर, अंगूठा दिखला अर्थात् 'त्वमङ्गुष्ठं गृहाण