सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७६ | सत्यार्थप्रकाशः |
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सुन-सुना के अन्य मत वाले श्रीकृष्ण जी की बहुत सी निन्दा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्ण जी के सदृश महात्माओं की झूठी निन्दा क्योंकर होती ? शिवपुराण में बारह ज्योतिर्लिङ्ग लिखे हैं। उसकी कथा सर्वथा असम्भव है। नाम धरा है ज्योतिर्लिङ्ग और जिस में प्रकाश का लेश भी नहीं। रात्रि को बिना दीप किये लिङ्ग भी अन्धेरे में नहीं दीखते, ये सब लीला पोप जी की है।
( प्रश्न ) जब वेद पढ़ने का सामर्थ्य नहीं रहा तब स्मृति, जब स्मृति के पढ़ने की बुद्धि नहीं रही तब शास्त्र, जब शास्त्र पढ़ने का सामर्थ्य न रहा तब पुराण बनाये, केवल स्त्री और शूद्रों के लिये। क्योंकि इन को वेद पढ़ने सुनने का अधिकार नहीं है।
( उत्तर ) यह बात मिथ्या है। क्योंकि सामर्थ्य पढ़ने-पढ़ाने ही से होता है और वेद पढ़ने सुनने का अधिकार सब को है। देखो ! गार्गी आदि स्त्रियां और छान्दोग्य में जानश्रुति शूद्र ने भी वेद 'रैक्यमुनि' के पास पढ़ा था और यजुर्वेद के २६वें अध्याय के दूसरे मन्त्र में स्पष्ट लिखा है कि वेदों के पढ़ने और सुनने का अधिकार मनुष्यमात्र को है। पुनः जो ऐसे-ऐसे मिथ्या ग्रन्थ बना लोगों को सत्यग्रन्थों से विमुख कर जाल में फंसा अपने प्रयोजन को साधते हैं वे महापापी क्यों नहीं ?
देखो ! ग्रहों का चक्र कैसा चलाया है कि जिस ने विद्याहीन मनुष्यों को ग्रस लिया है।
आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा ॥१॥ — सूर्य का मन्त्र ।
इ॒मं दे॑वाऽअसप॒त्नग्ं॑सुवध्वम्० ॥२॥ — चन्द्र ।
अ॒ग्निर्मूर्द्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः० ॥३॥ — मङ्गल ।
उद्बु॑ध्यस्वाग्ने० ॥४॥ — बुध ।
बृह॑स्पते॒ऽअति॒ यदर्यो॑ ॥५॥ — बृहस्पति ।
शु॒क्रमन्ध॑सः ॥६॥ — शुक्र ।
शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒० ॥७॥ — शनि ।
कया॑ नश्चि॒त्र आ भुव॑० ॥८॥ — राहु और-
के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॑ ॥९॥ — इस को केतु की कण्डिका कहते हैं ।
(आ कृष्णेन०) यह सूर्य और भूमि का आकर्षण ॥ १ ॥ दूसरा राजगुण विधायक ॥ २ ॥ तीसरा अग्नि ॥ ३ ॥ और चौथा यजमान ॥ ४ ॥ पांचवां विद्वान् ॥ ५ ॥ छठा वीर्य्य अन्न ॥ ६ ॥ सातवां जल, प्राण और परमेश्वर ॥ ७ ॥ आठवां मित्र ॥ ८ ॥ नववां ज्ञानग्रहण का विधायक मन्त्र है; ग्रहों के वाचक नहीं ॥ ९ ॥ अर्थ न जानने से भ्रमजाल में पड़े हैं।
( प्रश्न ) ग्रहों का फल होता है वा नहीं ?
( उत्तर ) जैसा पोपलीला का है वैसा नहीं किन्तु जैसा सूर्य्य चन्द्रमा की किरण द्वारा उष्णता शीतलता अथवा ऋतुत्वकालचक्र के सम्बन्धमात्र से अपनी प्रकृति के अनुकूल प्रतिकूल सुख-दुःख के निमित्त होते हैं। परन्तु जो पोपलीला वाले कहते