भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 296

२९६ | सत्यार्थप्रकाशः

रांम नाम लिख पथर तराई। भगति हेति औतार ही धरही॥
ऊंच नीच कुल भेद बिचारै। सो तो जनम आपणो हारै॥
सन्तां कै कुल दीसै नाहीं। रांम रांम कह राम सम्हांहीं॥
ऐसो कुण जो कीरति गावै। हरि हरिजन की पार न पावै॥
रांम संतां का अन्त न आवै। आप आपकी बुद्धि सम गावै॥

इनका खण्डन—प्रथम तो रामचरण आदि के ग्रन्थ देखने से विदित होता है कि यह ग्रामीण एक सादा सीधा मनुष्य था। न वह कुछ पढ़ा था; नहीं तो ऐसी गपड़चौथ क्यों लिखता ? यह केवल इन को भ्रम है कि राम-राम कहने से कर्म छूट जायें। केवल ये अपना और दूसरों का जन्म खोते हैं। जम का भय बड़ा भारी है परन्तु राजसिपाही, चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प, बीछू और मच्छर आदि का भय कभी नहीं छूटता। चाहे रात दिन राम-राम किया करे कुछ भी नहीं होगा। जैसे 'सक्कर-सक्कर' कहने से मुख मीठा नहीं होता वैसे सत्यभाषणादि कर्म किये बिना राम-राम करने से कुछ भी नहीं होगा। और यदि राम-राम करना, इन का राम नहीं सुनता तो जन्म भर कहने से भी नहीं सुनेगा और जो सुनता है तो दूसरी वार भी राम-राम कहना व्यर्थ है। इन लोगों ने अपना पेट भरने और दूसरों का भी जन्म नष्ट करने के लिये एक पाखण्ड खड़ा किया है। सो यह बड़ा आश्चर्य हम सुनते और देखते हैं कि नाम तो धरा रामस्नेही और काम करते हैं रांडसनेही का। जहां देखो वहां रांड ही रांड सन्तों को घेर रही हैं। यदि ऐसे-ऐसे पाखण्ड न चलते तो आर्यावर्त्त देश की दुर्दशा क्यों होती ? ये लोग अपने चेलों को भूठण खिलाते हैं और स्त्रियां भी लम्बी पड़ के दण्डवत् प्रणाम करती हैं। एकान्त में भी स्त्रियों और साधुओं की बैठक होती रहती है।

अब दूसरी इन की शाखा 'खेड़ापा' ग्राम मारवाड़ देश से चली है। उस का इतिहास—एक रामदास नामक जाति का ढेढ़ बड़ा चालाक था। उस के दो स्त्रियां थीं। वह प्रथम बहुत दिन तक औघड़ होकर कुत्तों के साथ खाता रहा। पीछे वामी कूंड़ापंथी। पीछे 'रामदेव' का 'कामड़िया' १ बना। अपनी दोनों स्त्रियों के साथ गाता था। ऐसे घूमता-घूमता 'सीथल' २ में ढेढ़ों का गुरु 'हररामदास' था; उस से मिला। उस ने उस को 'रामदेव' का पन्थ बता के अपना चेला बनाया। उस रामदास ने खेड़ापा ग्राम में जगह बनाई और इस का इधर मत चला। उधर शाहपुरे में रामचरण का। उस का भी इतिहास ऐसा सुना है कि वह जयपुर का बनियां था। उसने 'दांतड़ा' ग्राम में एक साधु से वेष लिया और उस को गुरु किया और शाहपुरे में आके टिक्की जमाई। भोले मनुष्यों में पाखण्ड की जड़ शीघ्र जम जाती है; जम गई। इन सब में ऊपर के रामचरण के वचनों के प्रमाण से चेला करके ऊंच नीच का कुछ भेद नहीं। ब्राह्मण से अन्त्यज पर्यन्त इन में चेले बनते हैं। अब भी कूंण्डापन्थी से ही हैं क्योंकि मिट्टी के कूंण्डों में ही खाते हैं। और साधुओं की भूठन खाते हैं। वेदधर्म से, माता, पिता संसार के व्यवहार से बहका कर छुड़ा देते और चेला बना लेते हैं, अब राम नाम को महामन्त्र मानते हैं और इसी को 'छुच्छम' ३ वेद भी कहते


१. राजपूताने में 'चमार' लोग भगवे वस्त्र रंग कर 'रामदेव' आदि के गीत, जिन को वे 'शब्द' कहते हैं, चमारों और अन्य जातियों को सुनाते हैं वे 'कामड़िये' कहलाते हैं।
२. 'सीथल' जोधपुर के राज्य में एक बड़ा ग्राम है।
३. छुच्छम अर्थात् सूक्ष्म।