सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 480 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशसमुल्लासः ३४५
चली जाय तो भी न दबे। उन टुकड़ों में से सौ वर्ष के अन्तरे एक टुकड़ा निकाले। जब वह कुआ रीता हो जाय तब उस में असंख्यात पूर्व पड़ें तब एक-एक पल्योपम काल होता है। वह पल्योपम काल कुआ के दृष्टान्त से जानना।
जब ‘दश क्रोड़ान् क्रोड़ पल्योपम काल बीतें तब एक ‘सागरोपम’ काल होता है। जब दश क्रोड़ान् क्रोड़ सागरोपम काल बीत जाय तब एक ‘उत्सर्पिणी’ काल होता है। और जब एक उत्सर्पिणी और एक अवसर्पिणी काल बीत जाय तब एक ‘कालचक्र’ होता है। जब अनन्त कालचक्र बीत जावें तब एक ‘पुद्गलपरावर्त्त’ होता है।
अब अनन्तकाल किस को कहते हैं ? जो सिद्धान्त पुस्तकों में नव दृष्टान्तों से काल की संख्या की है उस से उपरान्त ‘अनन्तकाल’ कहाता है। वैसे अनन्त पुद्गलपरावर्त्त काल जीव को भ्रमते हुए बीते हैं; इत्यादि।
( समीक्षक ) सुनो भाई ! गणितविद्यावाले लोगो ! जैनियों के ग्रन्थों की कालसंख्या कर सकोगे वा नहीं ? और तुम इस को सच भी मान सकोगे वा नहीं ? देखो ! तीर्थङ्करों ने ऐसी गणितविद्या पढ़ी थी। ऐसे-ऐसे तो इन के मत में गुरु और शिष्य हैं जिन की अविद्या का कुछ पारावार नहीं। और भी इन का अन्धेर सुनो।
रत्नसार भाग १ पृ० १३४ से लेके जो कुछ बूटाबोल अर्थात् जैनियों के सिद्धान्त ग्रन्थ जो कि उनके तीर्थङ्कर अर्थात् ऋषभदेव से लेके महावीर पर्य्यन्त चौबीस हुए हैं, उन के वचनों का सारसंग्रह है ऐसा रत्नसारभाग पृ० १४८ में लिखा है कि पृथिवीकाय के जीव मट्टी, पाषाणादि पृथिवी के भेद जानना। उन में रहने वाले जीवों के शरीर का परिमाण एक अंगुल का असंख्यातवां भाग समझना अर्थात् अतीव सूक्ष्म होते हैं। उन का आयुमान् अर्थात् वे अधिक से अधिक २२ सहस्र वर्ष पर्य्यन्त जीते हैं।
रत्न० पृ० १४९; वनस्पति के एक शरीर में अनन्त जीव होते हैं। वे साधारण वनस्पति कहाती हैं जो कि कन्दमूलप्रमुख और अनन्तकायप्रमुख होते हैं उन को साधारण वनस्पति के जीव कहने चाहिये। उन का आयुमान अनन्तमुहूर्त होता है परन्तु यहां पूर्वोक्त इन का मुहूर्त समझना चाहिए।
और एक शरीर में जो एकेन्द्रिय अर्थात् स्पर्श इन्द्रिय इन में है और उस में एक जीव रहता है उस को प्रत्येक वनस्पति कहते हैं। उस का देहमान एक सहस्र योजन अर्थात् पुराणिकों का योजन ४ कोश का परन्तु जैनियों का योजन १०००० दश सहस्र कोशों का होता है। ऐसे चार सहस्र कोश का शरीर होता है, उस का आयुमान अधिक से अधिक दश सहस्र वर्ष का होता है।
अब दो इन्द्रिय वाले जीव अर्थात् एक उन का शरीर और एक मुख जो शङ्ख, कौड़ी और जूं आदि होते हैं उन का देहमान अधिक से अधिक अड़तालीस कोश का स्थूल शरीर होता है। और उन का आयुमान अधिक से अधिक बारह वर्ष का होता है।
( समीक्षक ) यहां बहुत ही भूल गया क्योंकि इतने बड़े शरीर का आयु अधिक लिखता और अड़तालीस कोश की स्थूल जूं जैनियों के शरीर में पड़ती होगी और उन्हीं ने देखी भी होगी। और का भाग्य ऐसा कहां जो इतनी बड़ी जूं को देखे !!!
रत्नसार भाग १ पृ० १५०; और देखो इन का अन्धाधुन्ध ! बीछू, बगाई,