भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 356
३५६सत्यार्थप्रकाशः

का निषेध करते हैं परन्तु जो 'श्राद्ध दिनकृत्य' के पृष्ठ ४६ में लिखा है कि शासनदेवी ने रात्रि में भोजन करने के कारण एक पुरुष के थपेड़ा मारा उस की आंखें निकाल डालीं। उस के बदले बकरे की आंख निकाल कर उस मनुष्य के लगा दीं। इस देवी को हिंसक क्यों नहीं मानते ? रत्नसार भाग १। पृ० ६७ में देखो क्या लिखा है—मरुत्देवी पथिकों को पत्थर की मूर्त्ति होकर सहाय करती थी। इस को भी वैसी क्यों नहीं मानते ?

मूल—किं सोपि जणणि जाओ, जाणो जणणीइ किं गओ विद्धिं।
जई मिच्छरओ जाओ, गुणेसु तह मच्छनं वहइ॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० ८१ ॥

जो जैनमत विरोधी मिथ्यात्वी अर्थात् मिथ्या धर्म वाले हैं वे क्यों जन्मे ? जो जन्मे तो बढ़े क्यों ? अर्थात् शीघ्र ही नष्ट हो जाते तो अच्छा होता ॥ ८१ ॥

(समीक्षक) देखो ! इन के वीतरागभाषित दया, धर्म दूसरे मत वालों का जीवन भी नहीं चाहते। केवल इन की दया धर्म कथनमात्र है। और जो है सो क्षुद्र जीवों और पशुओं के लिये है; जैनभिन्न मनुष्यों के लिये नहीं।

मूल—सुद्धे मग्गे जाया, सुहेण गच्छन्ति सुद्ध मग्गंमि।
जे पुण अमग्गजाया, मग्गे गच्छन्ति तं चुय्यं ॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० ८३ ॥

सं० अर्थ—इस का मुख्य प्रयोजन यह है कि जो जैनकुल में जन्म लेकर मुक्ति को जाय तो कुछ आश्चर्य नहीं परन्तु जैनभिन्न कुल में जन्मे हुए मिथ्यात्वी अन्यमार्गी मुक्ति को प्राप्त हों इस में बड़ा आश्चर्य है। इस का फलितार्थ यह है कि जैनमत वाले ही मुक्ति को जाते हैं अन्य कोई नहीं। जो जैनमत का ग्रहण नहीं करते वे नरकगामी हैं॥ ८३ ॥

(समीक्षक) क्या जैनमत में कोई दुष्ट वा नरकगामी नहीं होता ? सब ही मुक्ति में जाते हैं ? और अन्य कोई नहीं ? क्या यह उन्मत्तपन की बात नहीं है ? विना भोले मनुष्यों के ऐसी बात कौन मान सकता है ?

मूल—तिच्छयराणं पूआ, संमत्त गुणाणकारिणी भणिया।
साविय मिच्छत्तयरी, जिण समये देसिया पूआ ॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० ९० ॥

सं० अर्थ—एक जिन मूर्तियों की पूजा सार और इस से भिन्नमार्गियों की मूर्त्तिपूजा असार है। जो जिन मार्ग की आज्ञा पालता है वह तत्त्वज्ञानी जो नहीं पालता है वह तत्त्वज्ञानी नहीं ॥ ९० ॥

(समीक्षक) वाह जी ! क्या कहना ! ! क्या तुम्हारी मूर्त्ति पाषाणादि जड़ पदार्थों की नहीं जैसी कि वैष्णवादिकों की हैं ? जैसी तुम्हारी मूर्त्तिपूजा मिथ्या है वैसी ही मूर्त्तिपूजा वैष्णवादिकों की भी मिथ्या है। जो तुम तत्त्वज्ञानी बनते हो और अन्यों को अतत्त्वज्ञानी बनाते हो इससे विदित होता है कि तुम्हारे मत में तत्त्वज्ञान नहीं है।

मूल—जिन आणाए धम्मो, आणा रहिआण फुड अहमुत्ति।
इय मुणि ऊणय तत्तं, जिण आणा कुणहु धम्मं ॥
—प्रक० भा० २। षष्टी० सू० ९२ ॥

सं०अर्थ—जो जिनदेव की आज्ञा दया क्षमादि रूप धर्म है उस से अन्य सब आज्ञा अधर्म हैं ॥ ९२ ॥

(समीक्षक) यह कितने बड़े अन्याय की बात है। क्या जैनमत से भिन्न कोई