सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| द्वादशसमुल्लासः | ३५९ |
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मूल— दूरे करणं दूरम्मि साहणं तह पभावणा दूरे। जिण धम्म सद्दहाणं पि तिरकदुरकाइ निट्ठवइ॥ —प्रक०भा० २। षष्टी०सू० १२७॥
सं०अर्थ— जिस मनुष्य से जैन धर्म का कुछ भी अनुष्ठान न हो सके तो भी जो 'जैन धर्म सच्चा है अन्य कोई नहीं' इतनी श्रद्धामात्र ही से दुःखों से तर जाता है॥ १२७॥
(समीक्षक) भला! इस से अधिक मूर्खों को अपने मतजाल में फंसाने की दूसरी कौन सी बात होगी? क्योंकि कुछ कर्म करना न पड़े और मुक्ति हो ही जाय ऐसा भोंदू मत कौन सा होगा?
मूल— कइया होही दिवसो, जइया सुगुरूूण पायमूलम्मि। उस्सुत्त लेस विसलव, रहिओ निसुणेसु जिण धम्मं॥ —प्रक०भा० २। षष्टी०सू० १२८॥
सं०अर्थ— जो मनुष्य जिनागम अर्थात् जैनों के शास्त्रों को सुनूंगा, उत्सूत्र अर्थात् अन्य मत के ग्रन्थों को कभी न सुनूंगा। इतनी इच्छा करे वह इतनी इच्छामात्र ही से दुःखसागर से तर जाता है॥ १२८॥
(समीक्षक) यह भी बात भोले मनुष्यों को फंसाने के लिए है। क्योंकि इस पूर्वोक्त इच्छा से यहां के दुःखसागर से भी नहीं तरता और पूर्वजन्म के भी संचित पापों के दुःखरूपी फल भोगे विना नहीं छूट सकता। जो ऐसी-ऐसी झूठ अर्थात् विद्याविरुद्ध बातें न लिखते तो इन के अविद्यारूप ग्रन्थों को वेदादि शास्त्र देख सुन सत्याऽसत्य जान कर इनके पोकल ग्रन्थों को छोड़ देते। परन्तु ऐसा जकड़ कर इन अविद्वानों को बांधा है कि इस जाल से कोई एक बुद्धिमान् सत्संगी चाहें छूट सके तो सम्भव है परन्तु अन्य जड़बुद्धियों का छूटना तो अति कठिन है।
मूल— जम्हा जेणहिं भणियं, सुय ववहारं विसोहियं तस्स । जायइ विसुद्ध बोही, जिण आणाराहगत्ताओ॥ —प्रक०भा० २। षष्टी०सू० १३८॥
सं०अर्थ— जो जिनाचार्यों ने कहे सूत्र निरुक्ति वृत्ति भाष्यचूर्णी मानते हैं वे ही शुभ व्यवहार और दुःसह व्यवहार के करने से चारित्रयुक्त होकर सुखों को प्राप्त होते हैं; अन्य मत के ग्रन्थ देखने से नहीं॥ १३८॥
(समीक्षक) क्या अत्यन्त भूखे मरने आदि कष्ट सहने को चारित्र कहते हैं? जो भूखा, प्यासा मरना आदि ही चारित्र है तो बहुत से मनुष्य अकाल वा जिन को अन्नादि नहीं मिलते भूखे मरते हैं वे शुद्ध हो कर शुभ फलों को प्राप्त होने चाहिये। सो न ये शुद्ध होवें और न तुम किन्तु पित्तादि के प्रकोप से रोगी होकर सुख के बदले दुःख को प्राप्त होते हैं। धर्म तो न्यायाचरण, ब्रह्मचर्य्य, सत्यभाषणादि है और असत्यभाषण अन्यायाचरणादि पाप है और सब से प्रीतिपूर्वक परोपकारार्थ वर्त्तना शुभ चरित्र कहाता है। जैनमतस्थों का भूखा, प्यासा रहना आदि धर्म नहीं। इन सूत्रादि को मानने से थोड़ा सा सत्य और अधिक झूठ को प्राप्त होकर दुःखसागर में डूबते हैं।
मूल— जइ जाणिंसि जिण नाहो, लोयायारा विपरकए भूओ। ता तं तं मन्नंतो, कह मन्नसि लोअ आयारं॥ —प्रक०भा० २। षष्टी०सू० १४८॥