सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० सत्यार्थप्रकाशः
भी दुर्गन्ध न हो किन्तु इसी का नाम अन्त्येष्टि, नरमेध, पुरुषमेध यज्ञ है। और जो दरिद्र हो तो बीस सेर से कम घी चिता में न डालें, चाहे वह भीख मांगने वा जाति वाले के देने अथवा राज से मिलने से प्राप्त हो परन्तु उसी प्रकार दाह करे। और जो घृतादि किसी प्रकार न मिल सके तथापि गाड़ने आदि से केवल लकड़ी से भी मृतक का जलाना उत्तम है क्योंकि एक विश्वा भर भूमि में अथवा एक वेदी में लाखों क्रोड़ों मृतक जल सकते हैं। भूमि भी गाड़ने के समान अधिक नहीं बिगड़ती और कबर के देखने से भय भी होता है। इससे गाड़ना आदि सर्वथा निषिद्ध है ॥२७॥
२८—परमेश्वर मेरे स्वामी अबिरहाम का ईश्वर धन्य है जिसने मेरे स्वामी को अपनी दया और अपनी सच्चाई बिना न छोड़ा। मार्ग में परमेश्वर ने मेरे स्वामी के भाइयों के घर की ओर मेरी अगुआई किई॥ –तौ० उत्प० पर्व० २४। आ० २७॥
( समीक्षक ) क्या वह अबिरहाम ही का ईश्वर था ? और जैसे आजकल बिगारी वा अगवे लोग अगुआई अर्थात् आगे-आगे चलकर मार्ग दिखलाते हैं तथा ईश्वर ने भी किया तो आजकल मार्ग क्यों नहीं दिखलाता ? और मनुष्यों से बातें क्यों नहीं करता ? इसलिए ऐसी बातें ईश्वर वा ईश्वर के पुस्तक की कभी नहीं हो सकतीं किन्तु जंगली मनुष्य की हैं॥ २८॥
२९—इसमअएल के बेटों के नाम ये हैं-इसमअएल का पहिलौठा नबीत और कीदार और अदबिएल और मिबसाम॥ और मिसमआ और दूमः और मस्सा॥ हदर और तैमा इतूर, नफीस और किदिमः॥ –तौ० उत्प० पर्व० २५। आ० १३। १४। १५॥
( समीक्षक ) यह इसमअएल अबिरहाम से उसकी हाजिरः दासी का पुत्र हुआ था॥ २९॥
३०—मैं तेरे पिता की रुचि के समान स्वादित भोजन बनाऊंगी॥ और तू अपने पिता के पास ले जाइयो जिसतें वह खाय और अपने मरने से आगे तुझे आशीष देवे॥ और रिबकः ने घर में से अपने जेठे बेटे एसौ का अच्छा पहिरावा लिया॥ और बकरी के मेम्नों का चमड़ा उसके हाथों और गले की चिकनाई पर लपेटा॥ तब यअकूब अपने पिता से बोला कि मैं आपका पहिलौठा एसौ हूं। आपके कहने के समान मैंने किया है, उठ बैठिये और मेरे अहेर के मांस में से खाइये जिसतें आप का प्राण मुझे आशीष दे॥ –तौ० उत्प० पर्व० २७। आ० ९। १०। १५। १६। १९॥
( समीक्षक ) देखिये! ऐसे झूठ कपट से आशीर्वाद ले के पश्चात् सिद्ध और पैगम्बर बनते हैं क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? और ऐसे ईसाइयों के अगुआ हुए हैं पुनः इनके मत की गड़बड़ में क्या न्यूनता हो? ॥ ३०॥
३१—और यअकूब बिहान को तड़के उठा और उस पत्थर को जिसे उसने अपना तकिया किया था खम्भा खड़ा किया और उस पर तेल डाला॥ और उस स्थान का नाम बैतएल रक्खा॥ और यह पत्थर जो मैंने खम्भा खड़ा किया ईश्वर का घर होगा॥ –तौ० उत्प० पर्व० २८। आ० १८। १९। २२॥
( समीक्षक ) अब देखिये जंगलियों के काम। इन्होंने पत्थर पूजे और पुजवाये और इसको मुसलमान लोग 'बैतएलमुकद्दस' कहते हैं। क्या यही पत्थर ईश्वर का घर और उसी पत्थरमात्र में ईश्वर रहता था ? वाह-वाह जी! क्या कहना है ईसाई लोगो! महाबुतपरस्त तो तुम्हीं हो॥ ३१॥
३२—और ईश्वर ने राहेल को स्मरण किया और ईश्वर ने उसकी सुनी