भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 480 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 412

४१२ सत्यार्थप्रकाशः

के अन्त लों सब दिन तुम्हारे संग हूँ॥ —इं० म० प० २८। आ० २। ६। ९। १०। १६। १७। १८। २०॥

( समीक्षक ) यह बात भी मानने योग्य नहीं, क्योंकि सृष्टिक्रम और विद्याविरुद्ध है। प्रथम ईश्वर के पास दूतों का होना, उनको जहां-तहां भेजना, ऊपर से उतरना, क्या तहसीलदारी, कलेक्टरी के समान ईश्वर को बना दिया ? क्या उसी शरीर से स्वर्ग को गया और जी उठा ? क्योंकि उन स्त्रियों ने उसके पग पकड़ के प्रणाम किया तो क्या वही शरीर था ? और वह तीन दिन लों सड़ क्यों न गया ? और अपने मुख से सब का अधिकारी बनना केवल दम्भ की बात है। शिष्यों से मिलना और उनसे सब बातें करनी असम्भव हैं। क्योंकि जो ये बातें सच हों तो आजकल भी कोई क्यों नहीं जी उठते ? और उसी शरीर से स्वर्ग को क्यों नहीं जाते ?

यह मत्तीरचित इञ्जील का विषय हो चुका। अब मार्करचित इञ्जील के विषय में लिखा जाता है॥ ९१॥

मार्क रचित इञ्जील

९२—यह क्या बढ़ई नहीं है। —इं०मार्क प० ६। आ० ३॥

( समीक्षक ) असल में यूसफ बढ़ई था, इसलिये ईसा भी बढ़ई था। कितने ही वर्ष तक बढ़ई का काम करता था। पश्चात् पैगम्बर बनता-बनता ईश्वर का बेटा ही बन गया और जंगली लोगों ने बना लिया तभी बड़ी कारीगरी चलाई। काट कूट फूट फाट करना उसका काम है॥ ९२॥

लूका रचित इञ्जील

९३—यीशु ने उससे कहा तू मुझे उत्तम क्यों कहता है, कोई उत्तम नहीं है, केवल एक अर्थात् ईश्वर॥ —इं० लू० प० १८। आ० १९॥

( समीक्षक ) जब ईसा ही एक अद्वितीय ईश्वर कहाता है तो ईसाइयों ने पवित्रात्मा पिता और पुत्र तीन कहां से बना लिये ?॥ ९३॥

९४—तब उसे हेरोद के पास भेजा॥ हेरोद यीशु को देख के अति आनन्दित हुआ क्योंकि वह उसको बहुत दिनों से देखने चाहता था इसलिये कि उसके विषय में बहुत सी बातें सुनी थीं और उसका कुछ आश्चर्य कर्म्म देखने की उसको आशा हुई॥ उसने उससे बहुत बातें पूछीं परन्तु उसने उसे कुछ उत्तर न दिया॥ —इं० लू० प० २३। आ० ७। ८। ९॥

( समीक्षक ) यह बात मत्तीरचित में नहीं है इसलिए ये साक्षी बिगड़ गये। क्योंकि साक्षी एक से होने चाहियें और जो ईसा चतुर और करामाती होता तो उत्तर देता और करामात भी दिखलाता। इससे विदित होता है कि ईसा में विद्या और करामात कुछ भी न थी॥ ९४॥

योहन रचित सुसमाचार

९५—आदि में वचन था और वचन ईश्वर के संग था और वचन ईश्वर था॥ वह आदि में ईश्वर के संग था॥ सब कुछ उसके द्वारा सृजा गया और जो सृजा गया है कुछ भी उस बिना नहीं सृजा गया। उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों का उजियाला था॥ —यो०प० १। आ० १। २। ३। ४॥