भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 480 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 416
४१६सत्यार्थप्रकाशः

गिर सकते हैं ? और सूर्यादि का आकर्षण उनको इधर-उधर क्यों आने जाने देगा ? और क्या आकाश को चटाई के समान समझता है ? यह आकाश साकार पदार्थ नहीं है जिस को कोई लपेटे वा इकट्ठा कर सके। इसलिये योहन आदि सब जंगली मनुष्य थे। उनको इन बातों की क्या खबर ? ॥ १०६ ॥

१०७—मैंने उनकी संख्या सुनी, इस्राएल के सन्तानों के समस्त कुल में से एक लाख चवालीस सहस्र पर छाप दी गई ॥ यिहूदा के कुल में से बारह सहस्र पर छाप दी गई ॥ —यो० प्र० प० ७। आ० ४। ५ ॥

( समीक्षक ) क्या जो बाइबल में ईश्वर लिखा है वह इस्राएल आदि कुलों का स्वामी है वा सब संसार का ? ऐसा न होता तो उन्हीं जंगलियों का साथ क्यों देता ? और उन्हीं का सहाय करता था। दूसरे का नाम निशान भी नहीं लेता। इससे वह ईश्वर नहीं। और इस्राएल कुलादि के मनुष्यों पर छाप लगाना अल्पज्ञता अथवा योहन की मिथ्या कल्पना है ॥ १०७ ॥

१०८—इस कारण वे ईश्वर के सिंहासन के आगे हैं और उसके मन्दिर में रात और दिन उसकी सेवा करते हैं ॥ —यो० प्र० प० ७। आ० १५ ॥

( समीक्षक ) क्या यह महाबुतपरस्ती नहीं है ? अथवा उनका ईश्वर देह-धारी मनुष्य तुल्य एकदेशी नहीं है ? और ईसाइयों का ईश्वर रात में सोता भी नहीं है। यदि सोता है तो रात में पूजा क्योंकर करते होंगे ? तथा उसकी नींद भी उड़ जाती होगी और जो रात दिन जागता होगा तो विक्षिप्त वा अति रोगी होगा ॥ १०८ ॥

१०९—और दूसरा दूत आके वेदी के निकट खड़ा हुआ जिस पास सोने की धूपदानी थी और उसको बहुत धूप दिया गया ॥ और धूप का धुंआ पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के संग दूत के हाथ में से ईश्वर के आगे चढ़ गया ॥ और दूत ने वह धूपदानी लेके उसमें वेदी की आग भर के उसे पृथिवी पर डाला और शब्द और गर्जन और बिजलियाँ और भुईंडोल हुए ॥ —यो० प्र० प० ८। आ० ३। ४। ५ ॥

( समीक्षक ) अब देखिये ! स्वर्ग तक वेदी, धूप, दीप, नैवेद्य, तुरही के शब्द होते हैं, क्या वैरागियों के मन्दिर से ईसाइयों का स्वर्ग कम है ? कुछ धूमधाम अधिक ही है ॥ १०९ ॥

११०—पहिले दूत ने तुरही फूंकी और लोहू से मिले हुए ओले और आग हुए और वे पृथिवी पर डाले गये और पृथिवी की एक तिहाई जल गई ॥ —यो० प्र० प० ८। आ० ७ ॥

( समीक्षक ) वाह रे ईसाइयों के भविष्यद्वक्ता ! ईश्वर, ईश्वर के दूत, तुरही का शब्द और प्रलय की लीला केवल लड़कों ही का खेल दीखता है ॥ ११० ॥

१११—और पांचवें दूत ने तुरही फूंकी और मैंने एक तारे को देखा जो स्वर्ग में से पृथिवी पर गिरा हुआ था और अथाह कुण्ड के कूप की कुंजी उसको दी गई ॥ और उसने अथाह कुण्ड का कूप खोला और कूप में से बड़ी भट्ठी के धुंए की नाईं धुंआ उठा ॥ और उस धुंए में से टिड्डियां पृथिवी पर निकल गई और जैसा पृथिवी के बीछुओं को अधिकार होता है तैसा उन्हें अधिकार दिया गया ॥ और उनसे कहा गया कि उन मनुष्यों को जिनके माथे पर ईश्वर की छाप नहीं है ॥ पांच मास उन्हें पीड़ा दी जाय ॥ —यो० प्र० प० ९। आ० १। २। ३। ४। ५ ॥

( समीक्षक ) क्या तुरही का शब्द सुनकर तारे उन्हीं दूतों पर और उसी