भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 426

४२६ सत्यार्थप्रकाशः

नहीं देता ? और मुसलमान लोग परिश्रम क्यों करते हैं ? ॥२॥ और जो बाइबल इज्जील आदि पर विश्वास करना योग्य है तो मुसलमान इज्जील आदि पर ईमान जैसा कुरान पर है वैसा क्यों नहीं लाते ? और जो लाते हैं तो कुरान१ का होना किसलिये ? जो कहें कि कुरान में अधिक बातें हैं तो पहली किताब में लिखना खुदा भूल गया होगा ! और जो नहीं भूला तो कुरान का बनाना निष्प्रयोजन है। और हम देखते हैं तो बाइबल और कुरान की बातें कोई-कोई न मिलती होंगी नहीं तो सब मिलती हैं। एक ही पुस्तक जैसा कि वेद है क्यों न बनाया ? क़यामत पर ही विश्वास रखना चाहिये; अन्य पर नहीं ? ॥ ३ ॥ क्या जो ईसाई और मुसलमान ही खुदा की शिक्षा पर हैं उन में कोई भी पापी नहीं है ? क्या ईसाई और मुसलमान अधर्मी हैं वे भी छुटकारा पावें और दूसरे धर्मात्मा भी न पावें तो बड़े अन्याय और अन्धेर की बात नहीं है? ॥४॥ और क्या जो लोग मुसलमानी मत को न मानें उन्हीं को काफिर कहना वह एकतर्फी डिगरी नहीं है ? ॥ ५ ॥ जो परमेश्वर ही ने उनके अन्तःकरण और कानों पर मोहर लगाई और उसी से वे पाप करते हैं तो उन का कुछ भी दोष नहीं। यह दोष खुदा ही का है फिर उन पर सुख-दुःख वा पाप-पुण्य नहीं हो सकता पुनः उन को सज़ा जज़ा क्यों करता है? क्योंकि उन्होंने पाप वा पुण्य स्वतन्त्रता से नहीं किया ॥ ५ ॥

६—उनके दिलों में रोग है, अल्लाह ने उन का रोग बढ़ा दिया ॥ —मं० १। सि० १। सू० २। आ० १० ॥

( समीक्षक ) भला विना अपराध खुदा ने उन का रोग बढ़ाया, दया न आई, उन बिचारों को बड़ा दुःख हुआ होगा ! क्या यह शैतान से बढ़कर शैतानपन का काम नहीं है ? किसी के मन पर मोहर लगाना, किसी का रोग बढ़ाना, यह खुदा का काम नहीं हो सकता क्योंकि रोग का बढ़ना अपने पापों से है ॥ ६ ॥

७—जिस ने तुम्हारे वास्ते पृथिवी बिछौना और आसमान की छत को बनाया ॥ —मं०१। सि०१। सू०२। आ० २२ ॥

( समीक्षक ) भला आसमान छत किसी की हो सकती है ? यह अविद्या की बात है। आकाश को छत के समान मानना हंसी की बात है। यदि किसी प्रकार की पृथिवी को आसमान मानते हों तो उनकी घर की बात है ॥ ७ ॥

८—जो तुम उस वस्तु से सन्देह में हो जो हम ने अपने पैगम्बर के ऊपर उतारी तो उस कैसी एक सूरत ले आओ और अपने साक्षी अपने लोगों को पुकारो अल्लाह के विना जो तुम सच्चे हो ॥ जो तुम और कभी न करोगे तो उस आग से डरो कि जिस का इन्धन मनुष्य है, और काफ़िरों के वास्ते पत्थर तैयार किये गये हैं ॥ —मं०१। सि०१। सू०२। आ०२३। २४ ॥

( समीक्षक ) भला यह कोई बात है कि उस के सदृश कोई सूरत न बने ? क्या अकबर बादशाह के समय में मौलवी फ़ैजी ने विना नुकते का कुरान नहीं बना लिया था ? वह कौन सी दोज़ख की आग है ? क्या इस आग से न डरना चाहिये ? इस का भी इन्धन जो कुछ पड़े सब है। जैसे कुरान में लिखा है कि काफ़िरों के वास्ते दोजख की आग तैयार की गई है तो वैसे पुराणों में लिखा है


१. वास्तव में यह शब्द “क़ुरआन” है परन्तु भाषा में लोगों के बोलने में क़ुरान आता है इसलिये ऐसा ही लिखा है।