भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 432

४३२ सत्यार्थप्रकाशः

दूसरी बात झूठी होगी ? और जो अल्लाह का मुख है तो वह सब ओर हो ही नहीं सकता। क्योंकि एक मुख एक ओर रहेगा, सब ओर क्योंकर रह सकेगा ? इसलिए यह संगत नहीं ॥ २७ ॥

२८—जो आसमान और भूमि का उत्पन्न करने वाला है। जब वो कुछ करना चाहता है यह नहीं कि उस को करना पड़ता है किन्तु उसे कहता है कि हो जा ! बस हो जाता है ॥ —मं० १। सि० १। सू० २। आ० ११७ ॥

** ( समीक्षक )** भला खुदा ने हुक्म दिया कि हो जा तो हुक्म किस ने सुना ? और किस को सुनाया ? और कौन बन गया ? किस कारण से बनाया ? जब यह लिखते हैं कि सृष्टि के पूर्व सिवाय खुदा के कोई भी दूसरा वस्तु न था तो यह संसार कहां से आया ? बिना कारण के कोई भी कार्य्य नहीं होता तो इतना बड़ा जगत् कारण के बिना कहां से हुआ ? यह बात केवल लड़कपन की है।

** ( पूर्वपक्षी )** नहीं नहीं, खुदा की इच्छा से।

** ( उत्तरपक्षी )** क्या तुम्हारी इच्छा से एक मक्खी की टांग भी बन जा सकती है ? जो कहते हो कि खुदा की इच्छा से यह सब कुछ जगत् बन गया।

** ( पूर्वपक्षी )** खुदा सर्वशक्तिमान् है इसलिये जो चाहे सो कर लेता है।

** ( उत्तरपक्षी )** सर्वशक्तिमान् का क्या अर्थ है ?

** ( पूर्वपक्षी )** जो चाहे सो कर सके।

** ( उत्तरपक्षी )** क्या खुदा दूसरा खुदा भी बना सकता है ? अपने आप मर सकता है ? मूर्ख रोगी और अज्ञानी भी बन सकता है ?

** ( पूर्वपक्षी )** ऐसा कभी नहीं बन सकता।

** ( उत्तरपक्षी )** इसलिये परमेश्वर अपने और दूसरों के गुण, कर्म, स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता। जैसे संसार में किसी वस्तु के बनने बनाने में तीन पदार्थ प्रथम अवश्य होते हैं—एक बनानेवाला जैसे कुम्हार, दूसरी घड़ा बनने वाली मिट्टी और तीसरा उस का साधन जिस से घड़ा बनाया जाता है। जैसे कुम्हार, मिट्टी और साधन से घड़ा बनता है और बनने वाले घड़े के पूर्व कुम्हार, मिट्टी और साधन होते हैं वैसे ही जगत् के बनने से पूर्व परमेश्वर जगत् का कारण प्रकृति और उन के गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं। इसलिये यह कुरान की बात सर्वथा असम्भव है ॥ २८ ॥

२९—जब हमने लोगों के लिये काबे को पवित्र स्थान सुख देने वाला बनाया तुम नमाज़ के लिये इबराहीम के स्थान को पकड़ो ॥ —मं० १। सि० १। सू० २। आ० १२५ ॥

** ( समीक्षक )** क्या काबे के पहले पवित्र स्थान खुदा ने कोई भी न बनाया था ? जो बनाया था तो काबे के बनाने की कुछ आवश्यकता न थी जो नहीं बनाया था तो विचारे पूर्वोत्पन्नों को पवित्र स्थान के बिना ही रक्खा था ? पहले ईश्वर को पवित्र स्थान बनाने का स्मरण न हुआ होगा ॥ २९ ॥

३०—वो कौन मनुष्य हैं जो इबराहीम के दीन से फिर जावें परन्तु जिस ने अपनी जान को मूर्ख बनाया और निश्चय हम ने दुनिया में उसी को पसन्द किया और निश्चय आखरत में वो ही नेक हैं॥ —मं० १। सि० १। सू० २। आ० १३० ॥

** ( समीक्षक )** यह कैसे सम्भव है कि जो इबराहीम के दीन को नहीं मानते वे सब मूर्ख हैं। इबराहीम को ही खुदा ने पसन्द किया इस का क्या कारण है?