सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ | सत्यार्थप्रकाशः
नहीं पकड़ता तो सब झूठ बोलेंगे शपथ तोड़ेंगे। इस से खुदा झूठ का प्रवर्त्तक होगा॥३९॥
४०—वो कौन मनुष्य है जो अल्लाह को उधार देवे। अच्छा बस अल्लाह द्विगुण करे उस को उस के वास्ते॥ —मं० १। सि० २। सू० २। आ० २४५॥
( समीक्षक ) भला खुदा को कर्ज़ उधार¹ लेने से क्या प्रयोजन ? जिस ने सारे संसार को बनाया वह मनुष्य से कर्ज़ लेता है? कदापि नहीं। ऐसा तो विना समझे कहा जा सकता है। क्या उस का ख़ज़ाना खाली हो गया था ? क्या वह हुण्डी पुड़िया व्यापारादि में मग्न होने से तोटे में फंस गया था जो उधार लेने लगा ? और एक का दो-दो देना स्वीकार करता है, क्या यह साहूकारों का काम है ? किन्तु ऐसा काम तो दिवालियों वा खर्च अधिक करने वाले और आय न्यून होने वालों को करना पड़ता है; ईश्वर को नहीं॥४०॥
४१—उनमें से कोई ईमान न लाया और कोई काफ़िर हुआ, जो अल्लाह चाहता न लड़ते, जो चाहता है अल्लाह करता है॥ —मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २४९॥
( समीक्षक ) क्या जितनी लड़ाई होती है वह ईश्वर ही की इच्छा से। क्या वह अधर्म करना चाहे तो कर सकता है ? जो ऐसी बात है तो वह खुदा ही नहीं, क्योंकि भले मनुष्यों का यह कर्म नहीं कि शान्तिभंग करके लड़ाई करावें। इस से विदित होता है कि यह कुरान न ईश्वर का बनाया और न किसी धार्मिक विद्वान् का रचित है॥४१॥
४२—जो कुछ आसमान और पृथिवी पर है सब उसी के लिये है ? चाहे उस की कुरसी ने आसमान और पृथिवी को समा लिया है॥ —मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २५५॥
( समीक्षक ) जो आकाश भूमि में पदार्थ हैं वे सब जीवों के लिये परमात्मा ने उत्पन्न किये हैं, अपने लिये नहीं क्योंकि वह पूर्णकाम है, उस को किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं। जब उस की कुर्सी है तो वह एकदेशी है। जो एकदेशी होता है वह ईश्वर नहीं कहाता क्योंकि ईश्वर तो व्यापक है॥४२॥
४३—अल्लाह सूर्य को पूर्व से लाता है बस तू पश्चिम से ले आ, बस जो काफिर था हैरान हुआ था, निश्चय अल्लाह पापियों को मार्ग नहीं दिखलाता॥ —मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २५८॥
( समीक्षक ) देखिये यह अविद्या की बात ! सूर्य्य न पूर्व से पश्चिम और न पश्चिम से पूर्व कभी आता जाता है, वह तो अपनी परिधि में घूमता रहता है। इस से निश्चित जाना जाता है कि कुरान के कर्त्ता को खगोल और न भूगोल विद्या आती थी। जो पापियों को मार्ग नहीं बतलाता तो पुण्यात्माओं के लिये भी मुसलमानों के खुदा की आवश्यकता नहीं। क्योंकि धर्मात्मा तो धर्ममार्ग में ही होते हैं। मार्ग तो धर्म से भूले हुए मनुष्यों को बतलाना होता है। सो कर्त्तव्य के न करने से कुरान
१. इसी आयत के भाष्य में तफसीरहुसैनी में लिखा है कि एक मनुष्य मुहम्मद साहब के पास आया। उसने कहा कि ऐ रसूलल्लाह खुदा कर्ज क्यों मांगता है ? उन्होंने उत्तर दिया कि तुम को बहिश्त में ले जाने के लिये। उस ने कहा जो आप जमानत लें तो मैं दूं। मुहम्मद साहब ने उसकी जमानत ले ली। खुदा का भरोसा न हुआ, उस के दूत का हुआ।