सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 480 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | सत्यार्थप्रकाशः |
|---|
तो थक भी गया होगा और अब तक सोता है वा जागा है ? यदि जागता है तो अब कुछ काम करता है वा निकम्मा सैल सपट्टा और ऐश करता फिरता है ॥७२ ॥
७३—मत फिरो पृथिवी पर झगड़ा करते ॥ —मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ७४॥
( समीक्षक ) यह बात तो अच्छी है परन्तु इस से विपरीत दूसरे स्थानों में जिहाद करना काफ़िरों को मारना भी लिखा है। अब कहो यह पूर्वापर विरुद्ध नहीं है ? इस से यह विदित होता है कि जब मुहम्मद साहेब निर्बल हुए होंगे तब उन्होंने यह उपाय रचा होगा और जब सबल हुए होंगे तब झगड़ा मचाया होगा। इसी से ये बातें परस्पर विरुद्ध होने से दोनों सत्य नहीं हैं ॥ ७३ ॥
७४—बस एक ही बार अपना असा डाल दिया और वह अजगर था प्रत्यक्ष ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १०७ ॥
( समीक्षक ) अब इस के लिखने से विदित होता है कि ऐसी झूठी बातों को खुदा और मुहम्मद साहेब भी मानते थे। जो ऐसा है तो ये दोनों विद्वान् नहीं थे क्योंकि जैसे आंख से देखने को और कान से सुनने को अन्यथा कोई नहीं कर सकता। इसी से ये इन्द्रजाल की बातें हैं ॥ ७४ ॥
७५—बस हम ने उन पर मेह का तूफान भेजा ! टीडी, चिचड़ी और मेंढक और लोहू ॥ बस उन से हम ने बदला लिया और उन को डुबो दिया दरियाव में ॥ और हम ने बनी इसराईल को दरियाव से पार उतार दिया ॥ निश्चय वह दीन झूठा है कि जिस में वे हैं और उन का कार्य्य भी झूठा है ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १३३। १३६ । १३७। १३९ ॥
( समीक्षक ) अब देखिये ! जैसा कोई पाखण्डी किसी को डरावे कि हम तुझ पर सर्पों को काटने के लिये भेजेंगे। ऐसी ही यह भी बात है। भला ! जो ऐसा पक्षपाती कि एक जाति को डुबा दे और दूसरी को पार उतारे वह अधर्मी खुदा क्यों नहीं। जो दूसरे मतों को कि जिन में हज़ारों क्रोड़ों मनुष्य हों झूठा बतलावे और अपने को सच्चा, उस से परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है ? क्योंकि किसी मत में सब मनुष्य बुरे और भले नहीं हो सकते। यह इकतर्फी डिगरी करना महामूर्खों का मत है। क्या तौरेत ज़बूर का दीन, जो कि उन का था; झूठा हो गया ? वा उन का कोई अन्य मज़हब था कि जिस को झूठा कहा और जो वह अन्य मज़हब था तो कौन सा था कहो कि जिस का नाम कुरान में हो ॥ ७५ ॥
७६—बस तू मुझ को अलबत्ता देख सकेगा, जब प्रकाश किया उस के मालिक ने पहाड़ की ओर उस को परमाणु-परमाणु किया। गिर पड़ा मूसा बेहोश ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १४३ ॥
( समीक्षक ) जो देखने में आता है वह व्यापक नहीं हो सकता। और ऐसे चमत्कार करता फिरता था तो खुदा इस समय ऐसा चमत्कार किसी को क्यों नहीं दिखलाता ? सर्वथा विद्या विरुद्ध होने से यह बात मानने योग्य नहीं ॥ ७६ ॥
७७—और अपने मालिक को दीनता डर से मन में याद कर, धीमी आवाज़ से सुबह को और शाम को ॥ —मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० २०५ ॥
( समीक्षक ) कहीं-कहीं कुरान में लिखा है कि बड़ी आवाज़ से अपने मालिक को पुकार और कहीं-कहीं धीरे-धीरे मन में ईश्वर का स्मरण कर। अब कहिये ! कौन सी बात सच्ची ? और कौन सी झूठी ? जो एक दूसरी बात से विरोध