भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 450

४५० | सत्यार्थप्रकाशः

से दोज़खी क्यों नहीं होना चाहिये ? ॥ ९७ ॥

९८—इसी प्रकार उतारा हम ने इस कुरान को अर्बी में, जो पक्ष करेगा तू उन की इच्छा का पीछे इस के आई तेरे पास विद्या से ॥ बस सिवाय इस के नहीं कि ऊपर तेरे पैग़ाम पहुँचाना है और ऊपर हमारे है हिसाब लेना ॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० ३७।४० ॥

( समीक्षक ) कुरान किधर की ओर से उतारा ? क्या खुदा ऊपर रहता है ? जो यह बात सच है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगाम पहुँचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत् एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है; ईश्वर का नहीं क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है ॥ ९८ ॥

९९—और किया सूर्य चन्द्र को सदैव फिरने वाला ॥ निश्चय आदमी अवश्य अन्याय और पाप करने वाला है ॥ —मं० ३। सि० १३। सू० १४। आ० ३३।३४ ॥

( समीक्षक ) क्या चन्द्र, सूर्य सदा फिरते और पृथिवी नहीं फिरती ? जो पृथिवी नहीं फिरे तो कई वर्षों का दिन रात होवे। और जो मनुष्य निश्चय अन्याय और पाप करने वाला है तो कुरान से शिक्षा करना व्यर्थ है। क्योंकि जिन का स्वभाव पाप ही करने का है तो उन में पुण्यात्मता कभी न होगी और संसार में पुण्यात्मा और पापात्मा सदा दीखते हैं। इसलिये ऐसी बात ईश्वरकृत पुस्तक की नहीं हो सकती ॥ ९९ ॥

१००—बस जब ठीक करूँ मैं उस को और फूंक दूं बीच उसके रूह अपनी से। बस गिर पड़ो वास्ते उस के सिजदा करते हुए ॥ कहा ऐ रब मेरे, इस कारण कि गुमराह किया तू ने मुझ को अवश्य जीनत दूंगा मैं वास्ते उन के बीच पृथिवी के और गुमराह करूंगा ॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १५। आ० २९। से ३९। तक ॥

( समीक्षक ) जो खुदा ने अपनी रूह आदम साहेब में डाली तो वह भी खुदा हुआ और जो वह खुदा न था तो सिजदा अर्थात् नमस्कारादि भक्ति करने में अपना शरीक क्यों किया ? जब शैतान को गुमराह करने वाला खुदा ही है तो वह शैतान का भी शैतान बड़ा भाई गुरु क्यों नहीं ? क्योंकि तुम लोग बहकाने वाले को शैतान मानते हो तो खुदा ने भी शैतान को बहकाया और प्रत्यक्ष शैतान ने कहा कि मैं बहकाऊंगा। फिर भी उस को दण्ड देकर कैद क्यों न किया ? और मार क्यों न डाला ? ॥ १०० ॥

१०१—और निश्चय भेजे हम ने बीच हर उम्मत के पैगम्बर ॥ जब चाहते हैं हम उस को, यह कहते हैं हम उस को हो! बस हो जाती है ॥ —मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० ३५।४० ॥

( समीक्षक ) जो सब कौमों पर पैग़म्बर भेजे हैं तो सब लोग जो कि पैग़म्बर की राय पर चलते हैं वे काफ़िर क्यों ? क्या दूसरे पैग़म्बर का मान्य नहीं सिवाय तुम्हारे पैग़म्बर के ? यह सर्वथा पक्षपात की बात है। जो सब देश में पैग़म्बर भेजे तो आर्य्यावर्त्त में कौन सा भेजा ? इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं। जब खुदा चाहता है और कहता है कि पृथिवी हो जा, वह जड़ कभी नहीं सुन सकती। खुदा का हुक्म क्योंकर बजा सकेगा ? और सिवाय खुदा के दूसरी चीज नहीं मानते तो सुना किस ने ? और हो कौन गया ? ये सब अविद्या की बातें हैं। ऐसी बातों को