सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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के समान विवाह भी कराता है, जानो कि मुसलमानों का पुरोहित ही है ॥ १४१ ॥
१४२—बस जब तुम मिलो उन लोगों से कि काफ़िर हुए बस मारो गर्दनें उन की यहां तक कि जब चूर कर दो उन को बस दृढ़ करो कैद करना ॥ और बहुत बस्तियां हैं कि वे बहुत कठिन थीं शक्ति में बस्ती तेरी से, जिस ने निकाल दिया तुझ को मारा हम ने उन को, बस न कोई हुआ सहाय देने वाला उन का ॥ तारीफ उस बहिश्त की कि प्रतिज्ञा किये गये हैं परहेज़गार, बीच उस के नहरें हैं बिन बिगड़े पानी की, और नहरें हैं दूध की कि नहीं बदला मज़ा उन का, और नहरें हैं शराब की मजा देने वाली वास्ते पीने वालों के और नहरें हैं शहद साफ किये गये की और वास्ते उन के बीच उस के मेवे हैं प्रत्येक प्रकार से दान मालिक उन के से ॥ —मं० ६। सि० २६। सू० ४७। आ० ४। १३। १५ ॥
( समीक्षक ) इसी से यह कुरान खुदा और मुसलमान गदर मचाने, सब को दुःख देने और अपना मतलब साधने वाले दयाहीन हैं। जैसा यहां लिखा है वैसा ही दूसरा कोई दूसरे मत वाला मुसलमानों पर करे तो मुसलमानों को वैसा ही दुःख जैसा कि अन्य को देते हैं हो वा नहीं ? और खुदा बड़ा पक्षपाती है कि जिन्होंने मुहम्मद साहेब को निकाल दिया उनको खुदा ने मारा। भला ! जिसमें शुद्ध पानी, दूध, मद्य और शहद की नहरें हैं वह संसार से अधिक हो सकता है ? और दूध की नहरें कभी हो सकती हैं ? क्योंकि वह थोड़े समय में बिगड़ जाता है ! इसीलिये बुद्धिमान् लोग कुरान के मत को नहीं मानते ॥ १४२ ॥
१४३—जब कि हिलाई जावेगी पृथिवी हिलाये जाने कर ॥ और उड़ाये जावेंगे पहाड़ उड़ाये जाने कर ॥ बस हो जावेंगे भुनगे टुकड़े-टुकड़े ॥ बस साहब दाहनी ओर वाले क्या हैं साहब दाहनी ओर के ॥ और बाईं ओर वाले क्या हैं बाईं ओर के ॥ ऊपर पलङ्ग सोने के तारों से बुने हुए हैं ॥ तकिये किये हुए हैं ऊपर उनके आमने-सामने ॥ और फिरेंगे ऊपर उनके लड़के सदा रहने वाले ॥ साथ आबखोरों के और आफताबों के और प्यालों के शराब साफ से ॥ नहीं माथा दुखाये जावेंगे उस से और न विरुद्ध बोलेंगे ॥ और मेवे उस किस्म से कि पसन्द करें ॥ और गोश्त जानवर पक्षियों के उस किस्म से कि पसन्द करें ॥ और वास्ते उन के औरतें हैं अच्छी आंखों वाली ॥ मानिन्द मोतियों छिपाये हुओं की ॥ और बिछौने बड़े ॥ निश्चय हम ने उत्पन्न किया है औरतों को एक प्रकार का उत्पन्न करना है ॥ बस किया है हम ने उन को कुमारी ॥ सुहागवालियां बराबर अवस्था वालियां ॥ बस भरने वाले हो उस से पेटों को ॥ बस कसम खाता हूँ मैं साथ गिरने तारों के ॥ —मं० ७। सि० २७। सू० ५६। आ० ४। ५। ६। ८। ९। १५। १६। १७। १८। १९। २०। २१। २२। २३। ३३। ३४। ३५। ३६। ३७। ३८। ५३ ॥
( समीक्षक ) अब देखिये कुरान बनाने वाले की लीला को ! भला पृथिवी तो हिलती ही रहती है उस समय भी हिलती रहेगी। इस से यह सिद्ध होता है कि कुरान बनाने वाला पृथिवी को स्थिर जानता था ! भला पहाड़ों को क्या पक्षीवत् उड़ा देगा ? यदि भुनगे हो जावेंगे तो भी सूक्ष्म शरीरधारी रहेंगे तो फिर उन का दूसरा जन्म क्यों नहीं ? वाह जी ! जो खुदा शरीरधारी न होता तो उस के दाहिनी ओर और बाईं ओर कैसे खड़े हो सकते ? जब वहाँ पलङ्ग सोने के तारों से बुने हुए हैं तो बढ़ई सुनार भी वहाँ रहते होंगे और खटमल काटते होंगे जो उन को रात्रि में सोने भी नहीं देते होंगे। क्या वे तकिये लगाकर निकम्मे बहिश्त में बैठे