सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 480 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशसमुल्लासः ४६९
छिपी हुई ॥ बस जो कोई दिया गया कर्मपत्र अपना बीच दाहिने हाथ अपने के, बस कहेगा लो पढ़ो कर्मपत्र मेरा ॥ और जो कोई दिया गया कर्मपत्र बीच बांये हाथ अपने के, बस कहेगा हाथ न दिया गया होता मैं कर्मपत्र अपना ॥ —मं० ७। सि० २९। सू० ६९। आ० १६। १७। १८। १९। २५॥
( समीक्षक ) वाह क्या फ़िलासफ़ी और न्याय की बात है ! भला आकाश भी कभी फट सकता है ? क्या वह वस्त्र के समान है जो फट जावे ? यदि ऊपर के लोक को आसमान कहते हैं तो यह बात विद्या से विरुद्ध है। अब कुरान का खुदा शरीरधारी होने में कुछ संदिग्ध न रहा। क्योंकि तख्त पर बैठना, आठ कहारों से उठवाना विना मूर्तिमान् के कुछ भी नहीं हो सकता ? और सामने वा पीछे भी आना-जाना मूर्तिमान् ही का हो सकता है। जब वह मूर्तिमान् है तो एकदेशी होने से सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् नहीं हो सकता और सब जीवों के सब कर्मों को कभी नहीं जान सकता। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि पुण्यात्माओं के दाहिने हाथ में पत्र देना, बचवाना, बहिश्त में भेजना और पापात्माओं के बायें हाथ में कर्मपत्र का देना, नरक में भेजना, कर्मपत्र बांच के न्याय करना ! भला यह व्यवहार सर्वज्ञ का हो सकता है? कदापि नहीं। यह सब लीला लड़केपन की है ॥ १४७ ॥
१४८—चढ़ते हैं फ़रिश्ते और रूह तर्फ उस की वह अज़ाब होगा बीच उस दिन के कि है परिमाण उस का पचास हज़ार वर्ष ॥ जब कि निकलेंगे कब्रों में से दौड़ते हुए मानो कि वह बुतों के स्थानों की ओर दौड़ते हैं। —मं० ७। सि० २९। सू० ७०। आ० ४। ४३॥
( समीक्षक ) यदि पचास हज़ार वर्ष दिन का परिमाण है तो पचास हज़ार वर्ष की रात्रि क्यों नहीं ? यदि उतनी बड़ी रात्रि नहीं है तो उतना बड़ा दिन कभी नहीं हो सकता। क्या पचास हज़ार वर्षों तक खुदा फ़रिश्ते और कर्मपत्र वाले खड़े वा बैठे अथवा जागते ही रहेंगे ? यदि ऐसा है तो सब रोगी हो कर पुनः मर ही जायेंगे। क्या कब्रों से निकल कर खुदा की कचहरी की ओर दौड़ेंगे ? उन के पास सम्मन कब्रों में क्योंकर पहुँचेंगे ? और उन बिचारों को जो कि पुण्यात्मा वा पापात्मा हैं। इतने समय तक सभी को कब्रों में दौरेसुपुर्द कैद क्यों रक्खा ? और आजकल खुदा की कचहरी बन्ध होगी और खुदा तथा फ़रिश्ते निकम्मे बैठे होंगे ? अथवा क्या काम करते होंगे। अपने-अपने स्थानों में बैठे इधर-उधर घूमते, सोते, नाच तमाशा देखते व ऐश आराम करते होंगे। ऐसा अन्धेर किसी के राज्य में न होगा। ऐसी-ऐसी बातों को सिवाय जङ्गलियों के दूसरा कौन मानेगा ? ॥ १४८ ॥
१४९—निश्चय उत्पन्न किया तुम को कई प्रकार से ॥ क्या नहीं देखा तुम ने कैसे उत्पन्न किया अल्लाह ने सात आसमानों को ऊपर तले ॥ और किया चांद को बीच उन के प्रकाशक और किया सूर्य को दीपक ॥ —मं० ७। सि० २९। सू० ७१। आ० १४। १५। १६॥
( समीक्षक ) यदि जीवों को खुदा ने उत्पन्न किया है तो वे नित्य अमर कभी नहीं रह सकते ? फिर बहिश्त में सदा क्योंकर रह सकेंगे ? जो उत्पन्न होता है वह वस्तु अवश्य नष्ट हो जाता है। आसमान को ऊपर तले कैसे बना सकता है ? क्योंकि वह निराकार और विभु पदार्थ है। यदि दूसरी चीज का नाम आकाश रखते हो तो भी उस का आकाश नाम रखना व्यर्थ है। यदि ऊपर तले आसमानों को बनाया है तो उन सब के बीच में चांद सूर्य्य कभी नहीं रह सकते। जो बीच