सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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दयानन्द ने ही इस ग्रन्थ में सब सम्प्रदायों को समाप्त कर एक सत्य-मतस्थ करने की प्रतिज्ञा की है और उसके उपाय भी बताये हैं।
महर्षि के ग्रन्थों की महिमा का पूर्ण परिज्ञान तो उनके बार-बार अध्ययन, मनन एवम् उसके अनुसार आचरण करने से ही हो सकता है। यहां तो केवल उस के विषय में यथासम्भव दिग्दर्शन मात्र ही कराया गया है।
आर्ष साहित्य में भाषा सरल एवं भाव गम्भीर होते हैं। उन के गम्भीर भावों को जानने के लिए उनका बार-बार अध्ययन करना चाहिए। श्री पं० गुरुदत्त विद्यार्थी ने जो अत्यन्त मेधावी थे, सत्यार्थप्रकाश को चौदह बार पढ़कर यह लिखा था कि जब-जब मैं इस ग्रन्थ को पढ़ता हूं तब-तब नई-नई बातें ही मुझ को मिलती हैं। इस में कुछ भी सन्देह नहीं कि इस आर्ष ग्रन्थ के अध्ययन से पाठकों को पं० गुरुदत्त जी के समान अमूल्य रत्न मिलेंगे।
ऋषि ने अपने समय में वर्तमान किसी भी अनार्ष साहित्य को पठन-पाठन में नहीं रखा। उन की इस पद्धति का अनुसरण किये विना सत्य ज्ञान की प्राप्ति दुर्लभ है। महर्षि की मान्यताओं पर श्रद्धा रखने वाले भी 'लेकिन शब्द का सहारा लेकर तदनुसार नहीं चलते। अतः वे अनार्ष ग्रन्थों से बहुत सी भ्रान्त धारणाएं प्राप्त कर सन्देहयुक्त ही रहते हैं। भ्रान्त संस्कार सत्यज्ञान की प्राप्ति में बराबर बाधक बने रहते हैं। गुरुवर विरजानन्द जी का यह कहना सर्वथा यथार्थ था कि “पहले अनार्ष ग्रन्थों को यमुना में डाल आओ फिर मेरे पास पढ़ने के लिए आना।”
ऋषि ने आर्ष ग्रन्थों के गुणों का कथन एवम् अपने समय में विद्यमान बहुत से अनार्ष ग्रन्थों को नामनिर्देश पूर्वक दोषयुक्त बताया तथा कतिपय वेदविरुद्ध ग्रन्थों के वचनों की अपने ग्रन्थों में समीक्षा भी की । उन्होंने जिन दोषों का कथन किया है वे दोष आज तक के समस्त अनार्ष साहित्य में भी विद्यमान हैं।
ऋषि का यह वचन भी ध्यान देने योग्य है कि जितना ज्ञान आवश्यक है वह वेदादि सच्छास्त्रों में उपलब्ध है। उनके ग्रहण में सब सत्य का ग्रहण हो जाता है। उन के अतिरिक्त विचार तो तदनुकूल होने से ही प्रामाणिक हैं। प्रथम आर्ष साहित्य पढ़े विना तदनुकूलता का ज्ञान कैसे हो सकता है ? अतः सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रथम आर्ष ग्रन्थ ही पढ़ने चाहिए; यह निश्चित तथ्य है।
अभी तक दोषपूर्ण ग्रन्थों का तथा उनकी मान्यताओं का बराबर प्रचार हो रहा है, उसको रोकना परम आवश्यक है। यह महर्षि दयानन्द तथा प्राचीन आर्ष ग्रन्थों के गम्भीर अध्ययन तथा उसके प्रचार एवं प्रसार से ही सम्भव है।
सत्यार्थप्रकाश द्वारा वैदिक धर्म का प्रचार सब से अधिक हुआ है, अतः 'आर्ष साहित्य-प्रचार ट्रस्ट' ने इस ग्रन्थ का प्रचार करना अपना मुख्य उद्देश्य निश्चित किया है। ट्रस्ट इस ग्रन्थ का सुन्दर प्रकाशन करके लागतमात्र से भी न्यून मूल्य में विक्रय करता है।
ऋषि के जीवनकाल में छपे द्वितीय-संस्करणानुसार सम्पादन कराके विशुद्ध मूलरूप प्रस्तुत किया गया है। ऋषि के मूल ग्रन्थ में कोष्ठक [ ] देने तथा ऋषि की इच्छा के विरुद्ध अपने नाम से टिप्पणी चढ़ाने एवं पाठ-परिवर्तन करने के पक्ष में हम नहीं हैं। किसी लेखक ने अपने मूल ग्रन्थ में किसी अन्य को पाठपरिवर्तन