सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयसमुल्लासः ५५
से मनुष्य सत्यासत्य का निश्चय कर सकता है अन्यथा नहीं।
धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्॥ –वै० अ० १। आ० १। सू० ४॥
जब मनुष्य धर्म के यथायोग्य अनुष्ठान करने से पवित्र होकर ‘साधर्म्य’ अर्थात् जो तुल्य धर्म है जैसा पृथिवी जड़ और जल भी जड़, ‘वैधर्म्य’ अर्थात् पृथिवी कठोर और जल कोमल, इसी प्रकार से द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन छः पदार्थों के तत्त्वज्ञान अर्थात् स्वरूपज्ञान से ‘निःश्रेयसम्’ मोक्ष प्राप्त होता है।
पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि॥ —वै० अ० १। आ० १। सू० ५॥
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन ये नव द्रव्य हैं।
क्रियागुणवत्समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्॥ –वै० अ० १। आ० १। सू० १५॥
‘क्रियाश्च गुणाश्च विद्यन्ते यस्मिंस्तत् क्रियागुणवत्’ जिस में क्रिया, गुण और केवल गुण भी रहें उस को द्रव्य कहते हैं। उन में से पृथिवी, जल, तेज, वायु, मन और आत्मा ये छः द्रव्य क्रिया और गुणवाले हैं तथा आकाश, काल और दिशा ये तीन क्रियारहित गुण वाले हैं। (समवायि) ‘समवेतुं शीलं यस्य तत् समवायि प्राग्वृत्तित्वं कारणं समवायि च तत्कारणं च समवायिकारणम् ।’ ‘लक्ष्यते येन तल्लक्षणम्’ जो मिलने के स्वभावयुक्त कार्य से कारण पूर्वकालस्थ हो उसी को ‘द्रव्य’ कहते हैं। जिस से लक्ष्य जाना जाय जैसा आंख से रूप जाना जाता है उसको ‘लक्षण’ कहते हैं।
रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी॥ —वै० अ० २। आ० १। सू० १॥
रूप, रस, गन्ध, स्पर्शवाली पृथिवी है। उस में रूप, रस और स्पर्श अग्नि, जल और वायु के योग से हैं।
व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः॥ –वै० अ० २। आ० २। सू० २॥
पृथिवी में गन्ध गुण स्वाभाविक है। वैसे ही जल में रस, अग्नि में रूप, वायु में स्पर्श और आकाश में शब्द स्वाभाविक है।
रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाः॥ –वै० अ० २। आ० १। सू० २॥
रूप, रस और स्पर्शवान् द्रवीभूत और कोमल जल कहाता है। परन्तु इन में जल का रस स्वाभाविक गुण तथा रूप, स्पर्श अग्नि और वायु के योग से हैं।
अप्सु शीतता॥ –वै० अ० २। आ० १। सू० ५॥
और जल में शीतलत्व गुण भी स्वाभाविक है।
तेजो रूपस्पर्शवत्॥ –वै० अ० २। आ० १। सू० ३॥
जो रूप और स्पर्शवाला है वह तेज है। परन्तु इस में रूप स्वाभाविक और स्पर्श वायु योग से है।
स्पर्शवान् वायुः॥ –वै० अ० २। आ० १। सू० ४॥
स्पर्श गुणवाला वायु है परन्तु इस में भी उष्णता, शीतता, तेज और जल