भारतकोश
सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)

Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished480 पृष्ठ

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पृष्ठ 59
तृतीयसमुल्लासः५९

न तु कार्याभावात्कारणाभावः॥ —वै० अ० १। आ० २। सू० २॥

कार्य के अभाव से कारण का अभाव नहीं होता।

कारणाऽभावात्कार्याऽभावः॥ —वै० अ० १। आ० २। सू० १॥

कारण के न होने से कार्य कभी नहीं होता।

कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः॥ —वै० अ० २। आ० १। सू० २४॥

जैसे कारण में गुण होते हैं वैसे ही कार्य्य में होते हैं। परिमाण दो प्रकार का है—

अणुमहदिति तस्मिन्विशेषभावाद्द्रिशेषाभावाच्च॥ —वै० अ० ७। आ० १। सू० ११॥

(अणु) सूक्ष्म (महत्) बड़ा। जैसे त्रसरेणु लिक्षा से छोटा और द्व्यणुक से बड़ा है तथा पहाड़ पृथिवी से छोटे, वृक्षों से बड़े हैं।

सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता॥ —वै० अ० १। आ० २। सू० ७॥

जो द्रव्य, गुण, कर्मों के सत् शब्द अन्वित रहता है अर्थात् 'सद् द्रव्यम्, सद् गुणः, सत्कर्म' सद् द्रव्य, सद् गुण, सत् कर्म अर्थात् वर्तमान कालवाची शब्द का अन्वय सब के साथ रहता है।

भावोऽनुवृत्तेरेव हेतुत्वात्सामान्यमेव॥ —वै० अ० १। आ० २। सू० ४॥

जो सब के साथ अनुवर्त्तमान होने से सत्तारूप भाव है सो महासामान्य कहाता है। यह क्रम भावरूप द्रव्यों का है और जो अभाव है वह पांच प्रकार का होता है।

क्रियागुणव्यपदेशाभावात्प्रागसत्॥ —वै० अ० ९। आ० १। सू० १॥

क्रिया और गुण के विशेष निमित्त के अभाव से प्राक् अर्थात् पूर्व (असत्) न था जैसे घट, वस्त्रादि उत्पत्ति के पूर्व नहीं थे इसका नाम 'प्रागभाव'। दूसरा—

सदसत्॥ —वै० अ० ९। आ० १। सू० २॥

जो होके न रहै जैसे घट उत्पन्न होके नष्ट हो जाय यह 'प्रध्वंसाभाव' कहाता है। तीसरा—

सच्चासत्॥ —वै० अ० ९। आ० १। सू० ४॥

जो होवे और न होवे जैसे 'अगौरश्वोऽनश्वो गौः' यह घोड़ा गाय नहीं और गाय घोड़ा नहीं अर्थात् घोड़े में गाय का और गाय में घोड़े का अभाव और गाय में गाय, घोड़े में घोड़े का भाव है। यह 'अन्योन्याभाव' कहाता है। चौथा—

यच्चान्यदसत्तस्तदसत्॥ —वै० अ० ९। आ० १। सू० ५॥

जो पूर्वोक्त तीनों अभावों से भिन्न है उसको 'अत्यन्ताभाव' कहते हैं। जैसे—'नरशृङ्ग' अर्थात् मनुष्य का सींग 'खपुष्प' आकाश का फूल और 'बन्ध्या पुत्र' बन्ध्या का पुत्र इत्यादि। पांचवां—

नास्ति घटो गेह इति सतो घटस्य गेहसंसर्गप्रतिषेधः॥ —वै० अ० ९। आ० १। सू० १०॥

घर में घड़ा नहीं अर्थात् अन्यत्र है, घर के साथ घड़े का सम्बन्ध नहीं