सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती विरचित)
Satyarth Prakash - Swami Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
४८० || सत्यार्थप्रकाशः
सिद्धान्तों को स्वीकार करता हूँ।
और जो मतमतान्तर के परस्पर विरुद्ध झगड़े हैं उन को मैं प्रसन्न नहीं करता क्योंकि इन्हीं मत वालों ने अपने मतों का प्रचार कर मनुष्यों को फंसा के परस्पर शत्रु बना दिये हैं। इस बात को काट सर्व सत्य का प्रचार कर सब को ऐक्यमत में करा द्वेष छुड़ा परस्पर में दृढ़ प्रीतियुक्त करा के सब से सब को सुख लाभ पहुँचाने के लिये मेरा प्रयत्न और अभिप्राय है।
सर्वशक्तिमान् परमात्मा की कृपा सहाय और आप्तजनों की सहानुभूति से 'यह सिद्धान्त सर्वत्र भूगोल में शीघ्र प्रवृत्त हो जावे' जिस से सब लोग सहज से धर्मार्थ काम, मोक्ष की सिद्धि करके सदा उन्नत और आनन्दित होते रहें। यही मेरा मुख्य प्रयोजन है॥
अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु ।
ओम् शन्नो॑ मि॒त्रः शं वरु॑णः॒ शन्नो॑ भवत्वर्य्य॒मा ।
शन्न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पति॑: शन्नो॒ विष्णु॑रुरुक्रमः॥
नमो॒ ब्रह्म॑णे॒ नर्मस्ते वायो॒ त्वमे॒व प्र॒त्यक्षं॒ ब्रह्मा॑सि ।
त्वामे॒व प्र॒त्यक्षं॒ ब्रह्मावादिषम् । ऋ॒तम॑वादिषम् । स॒त्यम॑वादिषम् ।
तन्माम॑वीत्॒ तद्व॒क्तार॑मावीत् । आवी॒न्माम् । आवीद्व॒क्तार॑म् ।
ओ३म् शा॒न्तिः शा॒न्तिः शा॒न्तिः॑ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य्याणां परमविदुषां
श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण
श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचितः
स्वमन्तव्यामन्तव्यसिद्धान्तसमन्वितः
सुप्रमाणयुक्तः सुभाषाविभूषितः
सत्यार्थप्रकाशोऽयं ग्रन्थः
सम्पूर्तिमगमत् ॥