सौन्दर्य-निखार (स्वदेशी चिकित्सा)
Saundarya Nikhar (Swadeshi Chikitsa)
राजीव दीक्षित द्वारा
स्रोत: Azadi Bachao Andolan First Edition · Azadi Bachao Andolan · 2010 (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 80 में से
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स्वास्थ्य और सौन्दर्य का शत्रु मोटापा
मोटापे का अर्थ है— शरीर में चर्बी यानी वसा का ज्यादा मात्रा में इकट्ठा हो जाना। चर्बी भी अजब चीज है। अगर संतुलन में हो तो शरीर को सुडौल बनाए रखती है, कम हो तो आदमी बेडौल दिखता है और ज्यादा हो जाए तो बेडौल ही क्या पूरा शरीर डॉवॉडोल हो जाता है। अर्थात् एक सीमा तक चर्बी जरूरी है, इसके बाद गैरजरूरी। जिनके शरीर में चर्बी संतुलित मात्रा में है, उनके लिए तो चिंता की कोई बात नहीं है पर जिनके शरीर में चर्बी की कमी है, वे चर्बी बढ़ाने के लिए और जिनके शरीर में चर्बी ज्यादा है, वे इसे घटाने के लिए परेशान दिखते हैं। इस अध्याय में हम चर्बी बढ़ने अर्थात् मोटापे की समस्या से निजात पाने की ही चर्चा करेंगे।
मोटापे की समस्या के जैविक कारणों पर तमाम वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध हैं, पर यहाँ उनकी गंभीर चर्चा बहुत जरूरी नहीं दिखती क्योंकि यह पुस्तक जनसामान्य को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है। अलबत्ता, मोटापे की समस्या के कुछ मोटे-मोटे पहलू जान लेना तो उपयोगी है ही।
दरअसल मोटापे की समस्या मुख्य रूप से दो तरह से पैदा होती है। कुछ लोगों में मोटापा वंशगत प्रभाव से आता है या शरीर की अन्दरूनी मशीनरी ऐसी होती है कि वे जो कुछ खाते हैं उसका ज्यादा हिस्सा चर्बी में तब्दील हो जाता है। यानी एक वर्ग ऐसा है जिनके शरीर में चर्बी जमा करने की खास प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा चौकन्ना रहने की जरूरत होती है। मोटापे का दूसरा और सबसे व्यापक कारण है लापरवाही भरी दिनचर्या। जरूरत से ज्यादा और सारे दिन कुछ न कुछ खाते रहने, आलस्य भरा और श्रमहीन जीवन बिताने, का ज्यादा सेवन करने जैसी आहार-विहार
की वजह से ज्यादातर लोग मोटापे के शिकार बनते हैं। एक सवाल यह है कि आखिर किस स्थिति को हम मोटापा कहेंगे ? तो इसका सामान्य सा उत्तर यह है कि जब तक शरीर की चुस्ती-फुर्ती कायम है और मन में उत्साह-उमंग बना हुआ है, तब तक मोटापे या दुबलेपन जैसी कोई समस्या नहीं है। यूँ सामान्यतः जितने इंच शरीर की लंबाई हो लगभग उतने ही किलो शरीर का वजन हो तो इसे संतुलित स्थिति मानी जाती है। इसमें उन्नीस-बीस के फर्क से कोई खास अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जब फर्क ज्यादा बढ़ने लगे तो समझिए कि सावधान होने का समय आ गया है। जिन बुजुर्गों का वजन, 30-35 वर्ष की उनकी स्वस्थ अवस्था जितना आज भी बना हुआ है, वे अपने को अच्छी स्थिति में मान सकते हैं।
मोटापे का आक्रमण सबसे पहले अक्सर पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों पर होता है। इसके बाद गर्दन, चेहरा, हाथ-पैर व शरीर के शेष अंग इसकी गिरफ्त में आते हैं। ध्यान रखने वाली बात है कि शुरूआती दौर में, या जब तक मोटापा पेट, कमर, कूल्हों और जाँघों तक ही सीमित है तब तक इसे दूर करना ज्यादा आसान है। लेकिन जब पूरे शरीर पर मोटापा अपना मजबूत कब्जा जमा लेता है तो इसे हटा पाना तकलीफदेह और मशक्कत भरा काम हो जाता है।
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