शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम पटल ] [ १०३ की ओर मुखों वाले स्रुक् और स्रुव् का हाथों से आदान करे। उनको तीन बार अग्नि में संतप्त करे और देशिक दर्भों को लेकर उनके द्वारा क्रमानुसार उनके अग्रभाग का मध्यका और भूतों का शोभन करे । बाँये हाथ से ग्रहण करके उन दोनों का दाहिने से प्रोक्षण करना चाहिये ।४२-४३। मन्त्रधारी पुनः उन दोनों को प्रतप्त करके फिर दर्भों को अग्नि में निक्षिप्त कर देवे । अपने दक्षिण भाग में कुशास्तर पर उस दोनों को स्थापित कर देना चाहिए ।४४। इसके अनन्तर आज्य की स्थाली को लाकर अस्त्र मन्त्र के द्वारा उसका प्रोक्षण करे। प्रोक्षण आदि से संस्कार किये हुए आज्य (घृत) को उसमें निक्षिप्त कर देवे । ।४५। निरूह्य वायव्येऽङ्गारान् हृदा तेषु निवेशयेद् । इदं तापनमुद्दिष्टं देशिकैस्तन्त्रवेदिभिः ।४६ सन्दीप्य दर्भयुगलमाज्ये क्षिप्त्वाऽनलेक्षिपेत् । गुरुर्हृदयमन्त्रेण पवित्रीकरणं त्विदम् ।४७ दीप्तेन दर्भयुग्मेन नीराज्याज्यं स वर्मणा । अग्नौ विसर्जयेद्ददर्भमभिद्योतनमीरितम् ।४८ घृते प्रज्वलितान्दर्भान् प्रदर्श्यस्त्राणुना गुरुः । जातवेदसि तान्न्यस्येदुद्योतनमिदं मतम् ।४६ गृहीत्वा घृतमङ्गारान् प्रत्यूह्याग्नौ जलं स्पृशेत् । अङ्गुष्ठोपकनिष्ठाभ्यान्दर्भौ प्रादेशसंमितौ ।५० घृत्वोत्पुनीयादस्त्रेण घृतमुत्पवनं त्विदम् तद्वद्धृदयमन्त्रेण कुशाभ्यामात्मसम्मुखम् ।५१ वायव्य कोण में कुन्ड की अग्नि से अङ्गारों को पृथक्-करके हृन्मन्त्र के द्वारा उनमें विनिवेशित कर देवे। मन्त्र के ज्ञाता आचार्यों के द्वारा इसको तापन बताया गया है ।४६। दो दर्भो सन्दीप्त करके आज्य में क्षिप्त करके फिर अनल में प्रक्षिप्त कर देना चाहिए । इसको गुरु और हृदय मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । यह पवित्री