भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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१५० ] [ श्री शारदा तिलक वेगा, भुवनमाला, मदनातुरा, अनङ्गा मदना, अनङ्गमेखला, अनङ्ग- कुसुमा, विश्व रूपा, असुर भयङ्करी, अक्षोभ्या, सत्यवादिनी, वज्ररूपा, शुचिव्रत । ३५।४२। वरदाख्या च वागीशा चतुःषष्टिः समीरिताः । चापबाणधरा सर्वा ज्वालाजिह्वाः समीरिताः ।४३ दंष्ट्रिण्यश्चोर्ध्वकेश्यास्ता युद्धोपक्रान्तमनसाः । सर्वाभरणसद्दीप्ताः पूजनीयाः प्रयत्नतः ।४४ लोकेशाः पूर्ववत्पूज्या स्तद्वद्वज्रादिकान्यपि । इत्थं यः पूजयेन्मन्त्री श्रीभूतलिपिदेवताम् ।४५ श्रीवाण्योः स भवेद्भूमिदेवैरप्यभिवन्द्यते । कमलैरयुतं हुत्वा राजानं वशमानयेत् ।४६ उत्पलैर्जुहुयात्तद्वन्महालक्ष्मीः प्रजायते । पलाशकुसुमैर्हुत्वा वत्सरेण कविर्भवेत् ।४७ राजी-लवणहोमेन वनितां वशमानयेत् । मातृकोक्तानि कर्माणि कुर्यादत्रापि साधकः ।४८ भूतलिप्या पुटीकृत्यं योमन्त्रं भजते नरः । क्रमोत्क्रमाच्छतावृत्त्या यस्य सिद्धो भवेन्मनुः ४६ वरदा, वागीशा, ये चौंसठ कही गई हैं। ये सब चाप और बाणों के धारण करने वाली हैं और इनकी जिह्वा ज्वाला बताई गई है। ।४३। ये दाढ़ों वाली है और ऊपर की ओर केशों वाली हैं। और ये युद्ध करने के लिए उपक्रान्त मन वाली हैं। ये समस्त आभरणों से दैदीप्यमान है। इनका प्रयत्न पूर्वक पूजन करना चाहिए ।४३।४४। लोकेशों का पूजन पूर्व की ही तरह करे तथा उनके आयुध वज्र आदि का भी अर्चन करना चाहिए। इस तरह से मन्त्रधारी जो श्रीभूत लिपि देवता का पूजन करता है वह श्री और वाणी का स्थान हो जाता है और देवगणों के द्वारा भी वन्दना किया जाया करता है। दश हजार आहुतियां कमलों के द्वारा देकर राजा को भी अपने वश में ले आया