शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ ] [ श्री शारदा तिलक वाग्भवं शम्भुवनिता रमा मकरकेतनः । तार्तीयं हि जगत्पात्रोर्वन्हिबीजसमुज्ज्वलः ।४५ अर्धीशढ्योभृगुस्त्यैहृत् मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । महालक्ष्म्याः समुद्दिष्ट स्ताराद्यः सर्वसिद्धिदः ।४६ ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम् । देवता जगतामादिर्महालक्ष्मीः समीरिना ।४७ हस्तौ संशोध्य मन्त्रेण तारादिहृदयांतिकम् । बीजानां पञ्चकं न्यस्येदंगुलीषु यथाक्रमम् ।४८ मंत्रशेषं न्यसेन्मन्त्री तलयोरुभयोरपि । मूर्धादि चरणं यावत् मन्त्रेण व्यापक न्यसेत् ।४६ नदी या आवर्त्त में समुत्पन्न पुष्पों के द्वारा फिर एक सहस्र आहु- तियां देवें । पूर्णिमा तिथि में विल्व के फलों से जो तीनों मधुरों से समाप्लुत होवें हवन करे । पंचमी तिथि में शुक्रवार के दिन विकसित कमलों से होम करे जो सुगन्धित होवें । विशाल बुद्धि वाले को प्रति मास हवन करना चाहिए चाहें कमलों के अभाव में अन्य विकसित पुष्प होवें । ऐसा करने वाला व्यक्ति केवल एक वर्ष पर्यन्त करने पर सम्प- दाओं की निधि हो जाया करता है ।४३।४४। वाग्भव—माया—वीज रमा—मकर केतन—तार्तीय वाला का या भैरवी का स्वरूप यकार—रेफ युक्त लेनप्र—ॐ से आढ्य सकार उससे सू—स्वरूप—हन्तम्—ताराद्य यह मन्त्र द्वादश अक्षरों वाला है जो महा लक्ष्मी का उद्दिष्ट किया गया है । ताराद्य सब सिद्धियों का देने वाला है ।४५।४६। इसके ऋषि ब्रह्मा कहे गये हैं और छन्द गायत्री होता है इसका देवता जगतों का आदि महालक्ष्मी बताई गई है ।४७। दोनों हाथों को भली भाँति-शुद्ध करके मन्त्र के द्वारा तार से आदि लेकर हृदय के समीप तक पाँचो वीजों का क्रमानुसार अंगुलियों में न्यास करना चाहिए ।४८। मन्त्रधारी को चाहिये कि मन्त्र के शेष दोनों तलों में न्यास करे । मूर्धा से आदि लेकर चरण पर्यन्त मन्त्र के द्वारा व्यापक न्यास करना चाहिए ।४६।