शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम पटल ] [ १७६ की ओर मन्त्रधारी को परम शुभ रत्नों के सुन्दर सिंहासन का स्मरण करना चाहिए । उस पर मध्य में मनोरमा महालक्ष्मी देवी का स्मरण करना चाहिए ।७३। अब ध्यान बतलाया जाता है—लाल सूर्य के सदृश्य कान्ति से संयुत—चन्द्रमा के खण्ड से शोभित, कोटीर मुकुट हार से समुज्ज्वल, रत्नाकल्प से विभूषित, स्थूल स्तनों से विनम्र होने वाली करों द्वारा मञ्जरी, पद्मयुगल, कौस्तुभ रत्न को निरन्तर धारण करती हुई, स्मित से युक्त आनन वाली, विकसित कमलों के सदृश लोचनों से समन्वित परादेवता का ध्यान करना चाहिए ।७४। बजती हुई मंजीरों से विभूषित चरण कमलों से विराजमान, नौ प्रकार के रत्नों के समूह से समाकीर्ण काञ्चीदाम (कौंधनी) से शोभित भागीरथी गङ्गा नदी के आवर्त (भँवर) के समान शोभा वाली नाभि से विभूषित, पाटीर के पंक, कपूर और कुंकुम से समसंकुल स्तनों वाली महालक्ष्मी का चिन्तन करे ।७५।७७। वारिवाहविनिर्मुक्तमुक्तादामगरीयसीम् । वहन्तीमुत्तरासङ्गेऽन्दुकूलपरिकल्पितम् ।७८ तप्तकाञ्चनसन्नद्धवैदूर्याङ्गदभूषणाम् । पद्मरागस्फुरद्धर्णकङ्कणाढ्यकराम्बुजाम् ।७६ माणिक्यशकलाबद्धमुद्रिकाभिरलङ्कृताम् । तप्तहाटकसंक्लृप्तमालाग्रैवेयशोभिताम् ।८० विचित्रविविधाकल्पकम्बुसंकाशकन्धराम् । उद्यद्दिनकराकारमणिटाटङ्कमण्डिताम् ८१ रत्नाङ्कितलसत्स्वर्णकर्णपूरोपशोभिताम् । जपाविद्रुमलावण्यललिताधरपल्लवाम् ।८२ दाडिमोफलबीजाभदन्तपङ्क्तिविभूषिताम् । कलङ्काशर्यनिर्मुक्तशरच्चन्द्रनिभानाम् ।८३ पुण्डरीकदलाकारनयनत्रसुन्दरीम् । भ्रूलताजितकन्दर्पकरकार्मुकविभ्रमाम् ।८४