भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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दशम पटल ] [ २२५ एक सप्ताह में दो परस्पर में अत्यन्त स्नेह वालेभी हों तो उसमें विद्वेष कर दिया करता है ।६०-६१। व्योम में गोमय को ग्रहण करके फिर तीन सहस्र जप करे और जाने वालों के द्वार देश में खोदकर गाड़ देने तो स्तम्भन हो जाता है ।६२। बहुत इसके विषयों में कहने से क्या लाभ है, साधक इस मंत्र के द्वारा सबका साधन कर लेता है । उत्तिष्ठ, इस पद को कहकर इसके अनन्तर पुरुष-यह पद होना चाहिए ।६३। पितामहः सनेत्रेन्दुः स्वपिषि स्याद्भयं च मे । समुपस्थितः मुच्चार्य यदि शक्यमनन्तरम् ।६४ अशक्यं वा पुनस्तन्मे वदेद्भगवति ततः । शमयाग्निवधूः सप्तत्रिंशद्वर्णात्मकोमनुः ।६५ ऋषिरारण्यकश्छन्दो प्रत्यनुष्टुपुदाहृतम् । देवता वनदुर्गा स्यात्सर्वदुर्गंविमोचनी ।६६ पादाष्टसन्धिषु गु०दलिङ्गाधारोदरेषु च । पार्श्वहृत्स्तनकण्ठेषु पुनवल्लिष्टसन्धिषु ।६७ मुखनासाकपोलाक्षिकर्णभ्रू मध्यमूर्द्धसु । मंत्राक्षराणि विन्यस्यद्देवताभावसिद्धये ।६८ षड्भिश्चतुर्भिरष्टाभिरष्टाभिः षड्भिरिन्द्रयैः । मंत्राणैरङ्गक्लुप्तिः स्याज्जातियुक्तैर्यथाक्रमम् ।६६ सौवर्णाम्बुजमध्यग त्रिनयनां सौदामिनीसन्निभां । चक्रं शंखवराभयानि दधतीमिन्दाः कलां बिभ्रतीम् ।७० ग्रैवेयाङ्गदहारकुण्डलधरामाखण्डलाद्यै स्तुतां । ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनीं शशिमुखीं पार्श्वस्थपञ्चाननाम् ।७१ इकार और विन्दुके सहित ककार-फिर स्वपिषि, यह पद है, फिर में भय समुपस्थित, यदि शक्यु में अथवा आशक्य होवे, इसके उपरान्त भगवति, यहपद कहे इसके आगे 'स्वाहा' कहे । और 'शमय' पद कहे । यह सैंतीस वर्णका मन्त्र होता है।६४-६५। इसकाऋषि आरण्यक है और इसका छन्द अनुष्टुप कहा गया है । इनका देवता वनदुर्गा है जो सभी